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Dr. Pranati Narayan

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Dr Pranati Narayan is a medical doctor working with BigOHealth as a content writer.

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Pregnancy me bleeding

Dr. Pranati Narayan

03 Apr, 2023

Pregnancy Me Bleeding

गर्भावस्था के दौरान, कभी कभी कुछ महिलाओ में रक्त के धब्बे या फिर रक्त श्रवित (ब्लीडिंग) होता है। परंतु रक्तस्राव (ब्लीडिंग) एवं खून के धब्बों (स्पॉटिंग) में अंतर होता है। जब योनि से हल्के रक्त का स्राव होता है तो उसको स्पॉटिंग या खून के धब्बे आना कहते है। ये उसी प्रकार के खून के धब्बों की तरह होता है जो महावारी (पीरियड्स) के शुरुवात एवं अंत में होता है। इसका रंग भूरा, हल्का भूरा या लाल हो सकता है तथा इसका प्रवाह कम होता है। वही दूसरी ओर रक्तस्राव में खून की मात्रा अधिक होती है और इस दौरान आपको सैनिटरी पैड की आवश्कता पड़ सकती है। **गर्भावस्था में ब्लीडिंग होने के सामान्य कारण** गर्भावस्था के दौरान निम्न परिस्थितियों में खून के धब्बे या रक्तस्रावहो सकता है – - गर्भावस्था के शुरुआती दौर में हल्की फुल्की ब्लीडिंग होना सामान्य है और यह लगभग चार में से एक महिला में होती हैं। इसका कारण होता है इंप्लांटेशन। जब भ्रुण बढ़ता है तो वह कोख की दीवार में प्रत्यारोपित ( ट्रांसप्लांट) होता है, यही इंप्लांटेशन कहलाता है। - स्पॉटिंग, बढ़ते हुए प्लेसेंटा ( अपरा) के कारण भी हो सकती है। 6 सप्ताह के गर्भधारण के पश्चात अपरा खुद ही गर्भावस्था के हार्मोन का निर्माण करने लगती है, जिसके कारण हल्का रक्तस्राव हो सकता है। - यदि आपने किसी प्रजनन उपचार कैसे आई वि इफ के जरिए गर्भधारण किया है तो आपको हल्के खून के धब्बे दिख सकते हैं। - इन कारणों के अतरिक्त गर्भावस्था के दौरान शरीर में कई अन्य प्रकार के बदलाव आते हैं जिसके कारण स्पॉटिंग हो सकती है। जैसे - योनि या गर्भाशय ग्रीवा में इन्फेक्शन होना, सर्वाइकल पोलिप, यूटराइन फाइब्रॉयड ( गर्भाशय के अंदर बनने वाले मांसपेशियों का ट्यूमर), गर्भावस्था के हार्मोन से ग्रीवा की सतह में बदलाव होने से जलन और असहजता के कारण रक्तस्राव हो सकता है। **कब प्रेगनेंसी में ब्लीडिंग होना हानिकारक है?** उपर्युक्त समान्य कारणों के अतिरिक्त इन परिस्थितियों में रक्त स्राव हो सकता है जो की आपके स्वास्थ के लिए हानिकारक हो सकता है। कुछ कारण निम्न हैं – - गर्भपात – कभी कभी गर्भावस्था की शुरुवात में भ्रुण का विकास सही ढंग से नहीं हो पाता, जिससे दुभाग्यवश गर्भपात हो जाता है। - एक्टोपिक प्रेगनेंसी ( अस्थानिक गर्भावस्था) – इस अवस्था में निषेतचित ( फर्टिलाइज्ड)डिंब गर्भाशय के अतिरिक्त आस पास अन्य जगह जैसे फैलोपियन ट्यूब में प्रत्यारोपित हो जाता है। ऐसे में रक्तस्राव होने लगता है। - मोलर गर्भावस्था – इसमें भी रक्तस्राव हो सकता है। इसमें गलत गुणसूत्रों ( क्रोमोसोम्स) के मिलने की वजह से भ्रुण का विकास नहीं हो पाता है। - वेनिशिंग ट्विन – कभी कभी जुड़वा बच्चे होने पर भी स्पोर्टिंग हो सकती है। ऐसा अक्सर तब होता है जब एक शिशु का विकास रुक जाता हैं और अंत में वह पूरी तरह गायब हो जाता है, इसको वेनिशिंग ट्विन कहते है। - कभी कभी जब प्रसव समय से पहले होने लगता है तब भी ब्लीडिंग हो सकती है। - इसके अतिरिक्त पेट पर आघात लगने से भी रक्त स्राव हो सकता है। सभी स्तिथियों में आपको एक बार स्त्री प्रसूति रोग विषेशज्ञ से अवश्य परामर्श लेना चाहिए। चिकत्सक देख समझ कर एवं जांचें करा कर आपको सही सलाह देते हैं। ऐसी परिस्थिति में आपको लापरवाही बिलकुल भी नहीं करनी चाहिए और खुद से अपना इलाज या घरुलू नुस्खे कदापि नहीं अपनाने चाहिए।
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pregnancy me anar khane ke fayde

Dr. Pranati Narayan

11 May, 2023

Pregnancy Me Anar Khane Ke Fayde

गर्भावस्था के दौरान गर्भवती महिला को वो हर चीज खानी चाहिए जो पोषक तत्वों से भरपूर हों। इन पोषक चीजों में अनार भी आता है तो शरीर को हाइड्रेट करने के साथ और भी अन्य चीज़े उपलब्ध कराता है। **अनार के पोषक तत्व** अनार कैल्शियम, फोलेट, आयरन, प्रोटीन, पोटेशियम, विटामिन सी, एंटीऑक्सीडेंट के साथ साथ फाइबर से भी भरपूर होता है। **प्रेग्नेसी में अनार खाने के फायदे** प्रेग्नेसी में अनार निम्न सहायता करता है - - अनार रक्त को तो साफ करता ही है इसके अतिरिक्त वह यूरिनरी संक्रमण की समस्या को भी नहीं होने देता। - अनार रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूत करता है। - अनार प्रेगनेंसी में होने वाली मलती और लगातार हो रही उल्टी को भी कम करता है। - कैल्शियम होने के कारण हड्डियों को मजबूती देता है। - फाइबर से भरपूर होने के कारण कब्ज नहीं होने देता एवं पाचन की अन्य समस्या जैसे एसिडिटी आदि को भी दूर करता है। - अनार विटामिन सी का अच्छा स्रोत होता है। विटामिन सी हमारे शरीर में आयरन को सोखने में सहायक होता है। और जब शरीर में उचित विटामिन सी और आयरन होता है तो इससे आयरन डिफिशिएंसी एनीमिया होने का खतरा भी कम हो जाता है। - इसमें उपस्थिति पोटेशियम गर्भावस्था में होने वाली पैरो की ऐंठन में भी राहत देता है। - प्रेगनेंसी में फोलेट अति आवश्यक होता है। यह भ्रुण के तंत्रिका तंत्र और न्यूरल ट्यूब का निर्माण करने से शिशु के मस्तिष्क का विकास सही तरीके से कराता है। प्रतिदिन एक गिलास अनार जा जूस फोलेट की आवश्यकता को 10 फीसदी तक पूरा करता है। **कितना अनार खाए?** हालाकि गर्भवति महिलाओं के लिए कोई मात्रा निर्धारित नहीं की गई है परंतु आपको एक व्यस्क की मात्रा से कुछ कम अनार का सेवन करना चाहिए। एक व्यस्क 56gm से 226gm तक की मात्रा में रोज अनार का सेवन कर सकता है। अनार को दिन में ही खाए रात में इसका सेवन न करें। **क्या अनार खाने का कोई नुकसान भी है?** अनार खाने से बहुत चिंताजनक नुकसान नहीं होते परंतु सावधानी से इसका सेवन करे। - अधिक मात्रा में सेवन करने से अनार आपका वजन बढ़ा सकता है क्यूंकि इस फल में अधिक कैलोरी होती है। - अनार का जूस कुछ दवाओं पर असर कर सकता है। अतः इसका सेवन करने से पहले डॉक्टर से राय लें। - अनार के अर्क का या सप्लीमेंट्स का सेवन गर्भावस्था में नही करना चाहिए। क्योंकि इसके ऊपर अभी कोई भी वैज्ञानिक खोज प्राप्त नहीं हुई है। - हर चीज बहुत अधिक मात्रा में हानिकारक हो सकती है चाहें वह कुछ भी हो। बहुत अधिक अनार का सेवन करने से आपके दातों का एनामेल भी खराब हो सकता है।
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periods me alcohol lena chahiye

Dr. Pranati Narayan

11 May, 2023

Periods Me Alcohol Lena Chahiye

शराब का सेवन करना कभी भी सेहत के लिए अच्छा नहीं माना गया है। अधिक मात्रा में शराब का सेवन करने से आपके शरीर पर बुरा असर पड़ता है तथा आप किसी न किसी प्रकार के रोग से भी ग्रस्त हो सकती हैं। वहीं पीरियड्स के दिनों में भी बहुत अधिक मात्रा में शराब पीने से बुरा असर पड़ता है। आइए जानते है शराब पीने से किन परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है – - पीरियड्स के दौरान शराब पीने से आपको निर्जलीयकारण ( डिहाइड्रेशन) की समस्या हो सकती है। इसी कारण से आपके पेट में मरोड़ भी और बढ़ सकती है। - शराब पीने से हार्मोन्स पर असर पड़ता है। शराब के सेवन से एस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरॉन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। शराब का सेवन करने से इन दोनो हार्मोन्स का स्तर कुछ देर के लिए बढ़ जाता है। परिणाम स्वरूप यह आपकी मेंस्ट्रुअल साइकिल ( मासिक धर्म चक्र) को प्रभावित करता है। - इसके अतिरिक्त शराब का सेवन करने आपको थकान और सुस्ती भी अधिक मेहसूस होगी जो कि आपका मूड खराब होने का कारण बन सकती है। आपको अधिक चिड़चिड़ाहट मेहसूस हो सकती है। अर्थात शराब पीने से पीएमएस ( प्री मेंसट्रूअल सिंड्रोम) के लक्षण बिगड़ सकते हैं। - शराब का सेवन करने से आपके शरीर में उपास्थिक पोषक पदार्थ जैसे मैंगनेशियम आदि पर भी असर पड़ता है। शराब का सेवन करने से मैंगनेशियम का स्तर कम हो सकता है जिसके फलस्वरूप आपकी ब्लड शुगर भी कम हो सकती है। इससे आपको चक्कर, कमजोरी आदि मेहसूस होगी। - शराब अन्य अंगो जैसे लीवर आदि को भी नुकसान पहुंचाती है। इस कारण से आपके पूरे शरीर की क्रिया उचित ढंग से नहीं हो पाती है एवं यह हार्मोस पर प्रभाव डालती है। इस कारण से आपको मासिक धर्म चक्र में परेशानियां आ सकती है। _निष्कर्ष क्या है?_ उपर्युक्त लेख से आप यह स्वतः समझ गए होने की पीरियड्स के दौरान शराब का सेवन करना सही नहीं है। इसीलिए पीरियड्स के दौरान शराब का सेवन कदापि न करें। शराब का सेवन करने से आपके मासिक धर्म चक्र पर प्रभाव पड़ सकता है जिससे आपको पीरियड्स की अनियमितता की परेशानी का भी सामना करना पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त शराब का सेवन करने से तनाव और अवसाद जैसी मानसिक उलझने भी जन्म लेती हैं और यह भी आपके मासिक धर्म चक्र को प्रभावित करती हैं।
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periods me adrak ke fayde

Dr. Pranati Narayan

11 May, 2023

Periods Me Adrak Ke Fayde

अधिकतर महिलाओं को पीरियड्स के दिनों में पेट के निचले भाग में पीड़ा अनुभव होती है, जिसे पीरियड क्रैम्प्स भी कहा जाता है। ये पीड़ा कभी कभी हल्की अथवा कभी कभी असेहनीय होती है, ऐसी महिलाएं पीड़ा को कम करने के लिए हर भरसक प्रयास करती है। इस पीड़ा से निजात पाने के लिए आप अदरक का भी प्रसोग कर सकते है। आइए जानें क्यों और कैसे? **पीरियड्स में पेट के निचले हिस्से में दर्द क्यों होता हैं?** पीरियड्स के दौरान एक प्रोस्टाग्लैंडिन नामक स्राव स्रावित होता है, जिससे बच्चेदानी ( यूटरस) की मांसपेशियों सिकुड़ती है ( कॉन्ट्रैक्ट) करती है। इसके परिणाम स्वरूप सूजन और दर्द होता है। कभी कभी यह दर्द फैल कर पीठ के निचली भाग में भी होने लगता है और पेट फूलना, सिर दर्द, उपकाई, उल्टी और कभी कभी अतिसार ( डायरिया) भी हो जाता है। **प्रेगनेंसी में अदरक के फायदे** अदरक में जिंजरऑल नामक पदार्थ होता है जो एंटीइंफ्लेमेटरी एवं एंटीओक्सीडेंट गुण युक्त होता है। यह पीरियड्स में दर्द से राहत दिला कर ऊर्जा भी प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त यदि आपके पीरियड्स इरेगुलर है तो भी आप अदरक को अपने खाने पीने में शामिल कर सकती हैं। **अदरक को कितनी मात्रा में सेवन करना चाहिए?** यदि आप अदरक का सेवन करते हैं तो ध्यान रखें की अदरक का सेवन दिन भर में 25 ग्राम से अधिक न हों। हर चीज अधिकांश मात्रा में हानिकारक होती है और अधिक मात्रा में अदरक का सेवन करने से बवासीर ( पाइल्स) की परेशानी हो सकती है। **अदरक का सेवन किस प्रकार से किया जा सकता है?** अदरक का सेवन आप निम्न रूप में कर सकते हैं – - अदरक की चाय - अदरक को पानी में उबाल कर पिए - अदरक का रस निचोड़ कर थोड़े से पानी में मिला कर पी सकते है। - इसके अतिरिक्त अदरक के रस को आप मधु में भी मिला कर पी सकते है। परंतु मधु का सेवन कभी भी उबाल कर न करें।
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कुत्ते के काटने पर क्या करे? घरेलु उपचार एवं इलाज।

Dr. Pranati Narayan

11 May, 2023

कुत्ते के काटने पर क्या करे? घरेलु उपचार एवं इलाज।

आजकल अधिकतर घरों में कोई न कोई पालतू जानवर होता है। किसी के पास बिल्ली, किसी के पास कछुआ तो किसी के पास कुत्ता पाला होता है। ये जानवर बेशक बहुत ही प्यारे होते है परन्तु इनसे बीमारियां होने का भी खतरा होता है। ऐसा अक्सर सुनने में आता है की सड़क पर चलते समय किसी कुत्ते ने काट लिया या खरोच मार दी। या फिर बंदर ने हमला कर दिया। दुनिया भर में कुत्ते से काटे जाने के लगभग 45 लाख केस हर साल आते हैं। इन जानवरों के काटने को आपको समान्य नहीं समझना चाहीए बल्कि इसका तुरंत उपचार करना चाहिए। यदि तुरंत प्राथमिक उपचार न किया जाए तो आप संक्रमित हो सकतें है और आपको रेबीज़ जैसी बीमारी या कुछ अन्य बीमारियां भी हो सकती है। हर साल रेबीज़ के कारण भारत में 18000 से ऊपर मृत्यु होती हैं। _**कुत्ते के काटने से क्या होता है?**_ यदि आपको कुत्ते ने काटा है या खरोच मारी है तो आपको असहनीय पीड़ा होने के साथ साथ कई कठिनाइयां हो सकती हैं। कुत्ते की लार में एक बैक्टेरिया पाता जाता है और यदि वो काट लेता है तो सही इलाज न करने पर वो बैक्टेरिया आपके शरीर में भी पहुंच कर संक्रमित कर सकता है। इसके इलावा आपके शरीर में कुछ अन्य लक्षण भी दिखाई दे सकते है। ये लक्षण इस बात पर निर्भर करते हैं कि कुत्ते ने कितनी गहराई से कटा हैं। _**रेबीज़ क्या हैं? क्या हर कुत्ते के काटने से रेबीज़ हो सकती है?**_ रेबीज़ एक ऐसा रोग है जिसका कारण वायरस होते हैं। इस रोग का प्रभाव केंद्रीय तंत्रिका पर होता है एवं इसकी चिकित्सा ना करने पर जान भी जा सकती है। यदि आप ये सोच रहे है की हर कुत्ते के काटने से रेबीज़ हो सकती है, तो आप गलत हैं। रेबीज़ केवल उन कुत्तों के काटने से ही होती है जिनको रेबीज़ है या फिर उनको रेबीज़ का टीका नहीं लगा है। कुत्ते के काटने पर तुरंत इलाज करवाने का कारण यही है की आप हमेशा ये नही जान सकते की किस कुत्ते को रेबीज़ का टीका लगा है अथवा किसको नही। _**कुत्ते के काटने पर क्या प्राथमिक उपचार करें?**_ यदि आपको या आपके किसी भी जाने वाले को कुत्ते ने काटा है तो प्राथमिक उपचार के लिए आप निम्नलिखित चीज़े कर सकते हैं - - घाव को डिटोल से पोंछे और साबुन लगा कर चलते पानी में 5-1० मिनट तक धोये। - शरीर का जो हिस्सा प्रभावित है उसे थोड़ा ऊपर उठा कर रखें। - यदि कोई एंटीबायोटिक क्रीम है तो उसको घाव पर लगा दे। - घाव की बैंडेज करे और डॉक्टर से परामर्श करें। सभी कुत्ते के काटने के घाव, यहां तक कि मामूली भी, संक्रमण के लक्षणों के लिए निगरानी की जानी चाहिए जब तक कि वे पूरी तरह से ठीक न हो जाएं। _**कुत्ते के काटने से क्या जटिलताएं हो सकती हैं?**_ अक्सर कुत्ते बहुत गंभीर रूप से नहीं काटते हैं और अधिकतर इसका शिकार बच्चे होते हैं। कुत्ते के काटने पर कुछ संक्रमण या जटिलताएं हो सकती हैं। जैसे - यदि किसी कुत्ते ने आपको काटा है और आपका मांस निकल गया या उस कुत्ते के दांत आपको ज्यादा गहराई में लग गए है, तो संभव है की आपकी त्वचा पर उसके निशान छूट जाए। - रेबीज़ - जो प्रभावित क्षेत्र होता है वहा आस पास सूजन आ सकती है। ऐसे में बुखार आना, ह्रदय गति तेज होना आदि लक्षण दिखते है। अक्सर ये सूजन एंटीबॉयटिक्स से सही हो जाती है। किंतु यदि संक्रमण फैलता है तो सेप्सिस होने का खतरा होता है। - मेनिनजाइटिस _**रेबीज के लक्षण**_ यह रोग शुरुवात में फ्लू जैसे लक्षण प्रकट करता है। बुखार, झुनझुनी, मांसपेशियों में कमजोरी आदि। रेबीज़ केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है और यह दो प्रकार के रोग विकसित कर सकता है। <u>उग्र रेबीज़</u> इसमें ये लक्षण दिखते हैं - - व्याकुलता और अशांति - अनिद्रा - चिंता - उलझन - लार का अधिक मात्रा में गिरना - पानी से डर लगना - निगलने में कठिनाई होना <u>पैरालिटिक रेबीज़</u> इसको होने में थोड़ा समय लगता है, परंतु यह भी उतना ही गंभीर होता है। धीमे धीमे संक्रमित व्यक्ति पैरालाइज हो जाता है और वह कोमा में भी जा सकता हैं। इस स्थिति में उसकी मृत्यु भी संभव है। _**कुत्ते के काटने के बाद कब और कितने इंजेक्शन लगवाए?**_ रेबीज़ से बचने के लिए इंजेक्शन दो प्रकार से लगते हैं। कुछ लोग सावधानी के तौर पर ही टिका लगवा लेते हैं जिससे वो कुत्तों के काटने से होने वाली बीमारी से बच सकें। इसको प्री एक्सपोजर वैक्सीनेशन कहा जाता है। डॉक्टर के अनुसार यह टीका उन लोगो को अवश्य लगवाना चाहिए जिनके घर में कुत्ते पले हों या फिर वो कुत्ता रखनेवाले हो। अगर आप ऐसी जगह जा रहे हो जहां रेबीज़ के केस अधिक हो या बहुत सारे आवारा कुत्ते हों, तब भी आपको प्री एक्सपोजर वैक्सीनेशन कराना चाहिए । यह टीकाकरण उन लोगों के लिए है जिनको उस कुत्ते ने काटा है जिसके रेबीज़ का इंजेक्शन लगा हुआ है। ऐसे में 3 इंजेक्शन लगते हैं। पहला इंजेक्शन कुत्ते के काटने के बाद उसी दिन 24 घण्टे के अंदर लगता है जिसदिन कुत्ते ने काटा हो। दूसरा इंजेक्शन तीसरे दिन लगता है। और तीसरा इंजेक्शन कुत्ते के काटने के 7 दिन बाद लगता है। ( प्री एक्सपोजर टीकाकरण) पोस्ट एक्सपोजर वैक्सीनेशन– इसमें टीके की 5 खुराक लगती हैं। तीसरी खुराक प्री एक्सपोजर वैक्सीनेशन के समान हैं । चौथी खुराक़ चौदवे दिन लगती है और पांचवीं खुराक 21 या 28 दिन पर लगती है। जब रेबीज़ का पहला इंजेक्शन लगता है उसी के साथ टेटनस का इंजेक्शन भी लगाया जाता है। इसका कारण यह है कि टेटनस किसी भी संक्रमित घाव से हो सकता है। जब कुत्ता काटता या खरोचता है जो घाव होता है और वह घाव कुत्ते की लार या उसके पंजों से संक्रमित होता है। यही कारण है की आपको रेबीज़ के साथ टेटनस का इंजेक्शन भी पहले दिन लगता है। अंततः आपको ये बात ध्यान में रखनी चाहिए कि कुत्ते के काटने पर टीका ज़रूर लगवाना चाहिए भले ही आपके पालतू कुत्ते ने आपको काटा हो। ऐसा करने पर आप खुद को बीमारियो से बचा सकते हैं। यदि आपके आस पास के लोग इस बात से जागरूक नहीं हैं की कुत्ते के काटने पर इंजेक्शन लगवाना चाहिए तो आपको इंसानियत के नाते उनको भी जागरूक करना चाहिए और उनका टीकाकरण करवाना चाहिए।
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pregnancy me delivery ke lakshan

Dr. Pranati Narayan

03 Aug, 2023

Pregnancy Me Delivery Ke Lakshan

जैसे जैसे डिलीवरी की डेट नजदीक आती जाती है वैसे ही आपके भी मन में ये भी प्रश्न आते हैं की आपको कैसे ज्ञात होगा की कौन से लक्षण प्रसव के शुरुवाती लक्षण है। कई बार ये समझना मुश्किल हो जाता है की प्रसव पीड़ा शुरू हो गई अथवा नहीं। जो महिलाएं पहली बार मां बनती हैं उन्हें अन्य से अधिक घबराहट के अतिरिक्त प्रसव को लेकर कई प्रश्न होते हैं। आइए इस लेख के मध्यम से जानें की प्रसव के क्या लक्षण हैं। **प्रसव क्या होता है?** जिस प्रक्रिया के द्वारा आपके गर्भ में पल रहा शिशु तथा प्रेसेंटा योनि के मध्यम से बाहर निकलता है, वह प्रक्रिया प्रसव कहलाती है। **यदि आपको नियमित दर्द भरे संकुचन महसूस हो रहे हैं, जो की समय के साथ अधिक प्रबल, पहले की अपेक्षा अधिक समय तक और बार बार महसूस हो रहे हैं; तो यह प्रसव शुरू होने के सबसे प्रमुख लक्षण है।** शिशु को गर्भ से बहार निकलने के परिणाम स्वरूप ही यह संकुचन होते हैं। जब गर्भस्थ शिशु बाहरी दुनिया में प्रवेश करने के लिए नीचे की ओर खिसकता है तो ग्रीवा, योनि, अन्य अंगो तथा मांसपेशियों में भी दवाब और खिंचाव होता है, इसी कारणवश अलग अलग प्रबलता की पीड़ा मेहसूस होती है। प्रसव पीड़ा अन्य सभी पीड़ाओ से अलग होती है। यह हर महिला में भिन्न होती है। जरूरी नहीं है की जैसी पीड़ा आपको पहली बार मां बनने में मेहसूस हुई हो वैसे ही आपको अगली बार मां बनने में भी महसूस हो। **प्रसव पीड़ा इस बात का संदेश होता है कि आपका शरीर बच्चे को जन्म देने के लिए कार्यरत हो गया है।** इसके अतिरिक्त कुछ अन्य लक्षण भी प्रसव का संकेत देते हैं जैसे – - नीचे की ओर पीठ तथा पेट में लगातार पीड़ा महसूस करना। - पेट में पीरियड्स ( महावारी) के समान ऐंठन महसूस करना। - पानी की थैली फटना (**इस स्तिथि में आपको तुरंत स्त्री प्रसूति विशेषज्ञ के पास जाना चाहिए**)। - म्यूकस प्लग का हट जाना। म्यूकस प्लग गर्भावस्था के दौरान ग्रीवा को बंद रखता है। इसके हटने से चिपचिपा जेली के समान म्यूकस स्रावित होता है जो कभी कभी रक्त युक्त भी हो सकता है। **जल्दी प्रसव शुरू होने के शुरुवाती लक्षण** यदि आपकी ड्यू डेट (प्रसव की देय तिथि) कुछ दिन, कुछ हफ्ते पास है तो आपको ऐसे लक्षण मेहसूस हो सकते है जो जल्दी ही प्रसव शुरू होने के सांकेतिक हों। ये लक्षण इस बात का संकेत देते हैं की आपका शरीर खुद को प्रसव के लिए तैयार कर रहा है। आप ऐसे में निम्न चीज़े महसूस कर सकती हैं – - यदि आपको चलने फिरने में अधिक तकलीफ हो रही है और बारंबार पेशाब जाना पड़ रहा है। - ऐसा इसलिए होता है क्यूंकि, प्रसव का समय नजदीक आते आते आपका शिशु श्रोणी में नीचे की तरफ आ जाता है। - योनि से अधिक स्राव होना जो की साफ या पीले म्यूकस युक्त हो। - ब्रक्स्टन हिक्स संकुचन होना। इसमें ऐसा लगता है की आपकी गर्भाशय की मांसपेशियां कसने लगी हैं या कड़ी होने लगी हैं। यदि आपको ऐसे कोई लक्षण हों तो तुरंत अपने स्त्री रोग विशेषज्ञ से मिलें।
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pregnancy me hemoglobin kitna hona chahiye

Dr. Pranati Narayan

17 Aug, 2023

Pregnancy Me Hemoglobin Kitna Hona Chahiye

गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को अपना विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता होती है, इस दौरान उनके हर तरह के क्रियाकलापों का एवम खान पान का सीधा प्रभाव उनके पेट में पल रहे बच्चे पर पड़ता है। गर्भावस्था के दौरान हीमोग्लोबिन स्तर में उतार-चढ़ाव की समस्या आम बात है, यह सामन्यतः हमारे खान पान पर निर्भर करता है, कुछ महिलाओं में इसका स्तर काफी हद तक कम हो जाता है, कुछ में सामान्य भी रहता है। **गर्भावस्था में हीमोग्लोबिन का सामान्य स्तर क्या होता है?** _गर्भावस्था में महिलाओं का हीमोग्लोबिन का स्तर 10.5 से 12DL_ तक होना चाहिए, यदि इससे कम होता है, तो आपके शरीर में पोषक तत्वों को कमी है, या फिर आपको एनीमिया भी हो सकता है। यदि ऐसा है, तो आपको डॉक्टर की सलाह लेने की आवश्यकता है, क्योंकि इस दौरान किसी भी प्रकार की लापरवाही आपके और आपके बच्चे के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध हो सकती है। **गर्भावस्था के दौरान हीमोग्लोबिन की कमी क्यों हो जाती है?** डॉक्टर्स के अनुसार गर्भावस्था में खून में पानी की मात्रा बढ़ जाती है, जिसके खून पतला हो जाता है, और जैसे जैसे खून पतला होता जाता है, हीमोग्लोबिन की मात्रा घटती जाती है। ब्लड प्लाज्मा ने वृद्धि के कारण RBC ki हानि हीमोग्लोबिन की कमी का कारण है। **हीमोग्लोबिन की कमी के क्या क्या लक्षण होंगे–** हीमोग्लोबिन की कमी के कारण थकान, कमजोरी, चक्कर आना, एवम आंखों के नीचे, तथा होंठो का सफेद सा पद जाना आदि लक्षण है। **हीमोग्लोबिन की मात्रा को कैसे बढ़ाएं?** - हीमोग्लोबिन के मात्रा को बढ़ाने के लिए हमे जरूरी पोषक तत्वों से भरपूर आहार का सेवन करना चाहिए। - हरी पत्तेदार सब्जियों को खाना चाहिए ,जैसे–पलक, मेथी आदि। - आयरन से भरपूर आहार का सेवन करना चाहिए। - खजूर, एवम अंजीर के सेवन से भी आप हीमोग्लोबिन को बढ़ा सकते हैं। अगर आपके हीमोग्लोबिन का लेवल कम होता है तो आप अपने डॉक्टर से जरूर परमर्श करें।
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बच्चों में बुखार के लक्षण, कारण, घरेलू उपचार और भोजन

Dr. Pranati Narayan

30 Sep, 2023

बच्चों में बुखार के लक्षण, कारण, घरेलू उपचार और भोजन

बच्चे हर मां बाप की जान होते हैं ऐसे में यदि बच्चों को बुखार आ जाए तो मां बाप चिकत्सक के पास घबराए हुए दौड़े चले आते हैं। परंतु आपको बता दे बुखार एक रोग नहीं है यह एक परेशानी है जिसका मुख्य कारण जानकर उसका हल निकालना चाहिए। यदि छोटा बच्चा आपके घर में है तो आपको एक थर्मोमीटर अवश्य रखना चाहिए। जब बुखार आता है तो शरीर का तापमान **37. 5° C या 99.5 °F** से अधिक हो जाता है। **बच्चों को बुखार में होने वाले लक्षण** यदि बच्चा बुखार से पीड़ित होता है तो निम्न लक्षण मिलते है - - कपकपी आना - सिर, पेट दर्द - खांसी - नाक का बहना - भूख कम लगना - मिचली या उल्टी आना **बच्चों में बुखार आने का कारण** कई बार बुखार किस कारण से है ये नही पता चल पाता है परन्तु बुखार तभी होता है जब शरीर में कोई न कोई इन्फेक्शन हुआ हो। बुखार आने के कुछ कारण ये हो सकते हैं - - शिशुओ और बच्चों में कान का संक्रामण होना। - श्वासन पथ का संक्रमण होना। - गलतुंडिका में सूजन होना अर्थात टॉन्सिलाइटिस होना। - पेट या मूत्रमार्ग में संक्रमण होना। - मच्छर जनित रोग होना जैसे मलेरिया, डेंगू आदि। - अक्सर बच्चों के दांत निकलने पर भी बुखार आता है। **कैसे जानें कि शिशु को बुखार है?** यदि आपको अपने शिशु में उपर्युक्त कुछ लक्षण दिखते हैं या आपको ऐसा लग रहा है की आपके शिशु को ज्वार अर्थात बुखार हो सकता है तो आपको **थर्मामीटर** के द्वारा बुखार कितना है ये पता लगना चाहिए। बिना बुखार के **बस माथा चू लेने के कई बार बुखार होते हुए भी ज्ञात नही हो सकता**और यदि हो भी जाता है तो आप उसका सही माप नहीं जान सकते। इसलिए अपने शिशु का बुखार जानने हेतु थर्मामीटर का प्रयोग करना अनिवार्य है। **थर्मामीटर का इस्तेमाल कैसे करें?** थर्मामीटर भी बाजार में 2 प्रकार का उपल्ब्ध है– 1. मर्करी (पारा) थर्मामीटर 2. डिजिटल थर्मामीटर <u>डिजिटल थर्मामीटर प्रयोग करने की विधि</u> - सर्वप्रथम आपको डिजिटल थर्मामीटर का बटन दबाकर उसे ओन करना है। - इसके बाद यदि आपका बच्चा बहुत ही छोटा है तो थर्मोमीटर को अपने बच्चे की कांख (अर्थात बगल) में और यदि थोड़ा बड़ा (3 साल से ज्यादा उम्र) है तो उसके जीभ के निचले हिस्से में पीछे की तरफ स्थिर करना है। कांख में लगाने के बाद हाथ को नीचे करदे या अगर जीभ में लगा तो रहे तो बच्चे को अपने होठों को बंद करने को बोलें । - कुछ मिनटों में डिजिटल थर्मामीटर से एक बीप की आवाज आएगी तत्पश्चात थर्मामीटर को निकाल लें और उसपर आया हुआ तापमान लिख लें। - थर्मामीटर को तापमान लेने के बाद बिना धुले कभी भी न रखें। हमेशा पानी से धूल कर रखें। <u>मर्करी (पारा) थर्मामीटर प्रयोग करने की विधि</u> - सर्वप्रथम आपको थर्मामीटर पानी (ठंडा या सामान्य ताप) या साबुन से धो लेना है। - तापमान कम करने के लिए थर्मामीटर को हिलाएं। तापमान मापने के बाद ग्लास थर्मामीटर हमेशा खुद को रीसेट नहीं करते हैं। इसे सिरे से दूर अंत में पकड़ें और थर्मामीटर को आगे-पीछे घुमाएँ। यह सुनिश्चित करने के लिए जांचें कि यह कम से कम 96.8 डिग्री फ़ारेनहाइट (36.0 डिग्री सेल्सियस) से नीचे चला जाए। - इसके बाद यदि आपका बच्चा बहुत ही छोटा है तो थर्मोमीटर को अपने बच्चे की कांख (अर्थात बगल) में और यदि थोड़ा बड़ा (3 साल से ज्यादा उम्र) है तो उसके जीभ के निचले हिस्से में पीछे की तरफ स्थिर करना है। कांख में लगाने के बाद हाथ को नीचे करदे या अगर जीभ में लगा तो रहे तो बच्चे को अपने होठों को बंद करने को बोलें । - थर्मामीटर को 2-4 मिनट के लिए उसी स्थान पर छोड़ दें। - तापमान पढ़ने के लिए थर्मामीटर को क्षैतिज रूप (आड़ा/हॉरिजॉन्टल ) से पकड़ें। इसे आंखों के स्तर तक लाएं और तरल का सिरा ठीक आपके सामने हो। लंबी रेखाएँ देखें, जो प्रत्येक 1 °F (या 1 °C) दर्शाती हैं और छोटी रेखाएँ, जो प्रत्येक 0.2 °F (या 0.1 °C) दर्शाती हैं। तरल के अंत तक निकटतम संख्या पढ़ें, यदि आवश्यक हो तो छोटी रेखाओं को गिनें। **बुखार के दौरान बच्चे को क्या खिलाएं??** यदि आपका बच्चा केवल स्तन्य पान करता है तो बुखार आने पर भी उसको माँ का दुग्ध पिलाती रहे जबतक आप कोई गंभीर बीमारी से रोगग्रसित नहीं है। आमतौर पर बुखार आने पर लघु और सुपाच्य भोजन देना चाहिए। बुखार के समय चीज, पनीर, बाहर का खाना, फास्ट फूड, अधिक तैलीय पदार्थ आदि न दें। बेहतर रहेगा बुखार आने पर आप अपने बच्चे को घर का बना लघु खाना दें। बच्चों को बुखार के समय आप हरी सब्जियों, टमाटर और हरी सब्जियों से निर्मित सूप, खिचड़ी, दाल का पानी, गुनगुना दुग्ध, उबला आलू इत्यादि दे सकते हैं। **बुखार कम करने के कुछ घरेलू उपचार** यदि आप अपने शिशु का बुखार घर पर कम करना चाहते है तो उसके लिए कुछ घरेलू उपचार कर सकते है। – - नींबू और शहद को 1-1 बड़ा चम्मच ले और अच्छे से मिलाएं। फिर इसको बच्चे को खाने के लिए दे। - अपने बच्चे की मालिश सरसों के तेल और लहसुन से करें। परंतु यदि आपके शिशु को दाने है, चक्काते है तो इसका प्रगोग न करें। इसके अतिरिक्त कुछ बच्चो को लहसुन से अलर्जी भी हो सकती है। इसीलिए इसका प्रयोग सावधानी से करें। - यदि बुखार के कारण आपके बच्चे का शरीर, माथा अत्याधिक तप रहा है तो आप ठंडे सेक का माथे और गर्दन पर प्रयोग कर सकते हैं। - ध्यान रहें उपर्युक्त केवल उपाय है इलाज नहीं। बिना जाने समझे कोई भी घरेलू नुस्खा अपने बच्चो पर न आजमाए क्योंकि **कई बार घरेलु नुस्खे बीमारी को जटिल बना सकते हैं।** **बुखार आने पर अपने बच्चे में निम्न बिंदिओ का ध्यान रखें –** - पानी की कमी न होने दे। - ठंड से बचाएं - धुएं से दूर रखे - हल्के आरामदायक वस्त्र पहनाए - बुखार आने पर घर पर अपने बच्चे का बुखार थर्मोमीटर से लें। बच्चे के बुखार को माप कर एक जगह लिखते जाएं। ऐसा करने से आपको पता चलता रहेगा की आपके बच्चे का बुखार कितना काम हुआ है और चिकत्सक को भी दवाई कितनी असर कर रही है, बुखार आने का क्या कारण है ये जाने में सहायता मिलती है।
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Chemotherapy in Hindi: chemotherapy in Hindi meaning

Dr. Pranati Narayan

25 Jan, 2025

Chemotherapy In Hindi: Chemotherapy In Hindi Meaning

केमोथेरेपी, जिसे हिंदी में **"कीमोथेरेपी"** या "**कैंसर का कीमो**" कहा जाता है, एक चिकित्सीय उपचार विधि है जिसका उपयोग कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है। यह उपचार विशेष रूप से कैंसर की कोशिकाओं को नष्ट करने या उनके विकास को रोकने के लिए काम करता है। **कीमोथेरेपी में दवाइयों का उपयोग किया जाता है**, इसे आमतौर पर **IV (इंट्रावीनस) के माध्यम से या मौखिक रूप** से दिया जा सकता है। यह कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने और उनके विकास को रोकने में एक शक्तिशाली उपकरण है, और यह मानवता के लिए अब तक के सबसे प्रभावी उपचारों में से एक माना जाता है। **Chemotherapy kya hota hai? (केमोथेरेपी क्या है?)** कीमोथेरेपी एक चिकित्सा उपचार है जिसमें विशेष दवाइयों का प्रयोग किया जाता है। यह दवाइयाँ शरीर में कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने, उनके विकास को रोकने या उन्हें फैलने से रोकने के लिए डिज़ाइन की जाती हैं। कीमोथेरेपी का उद्देश्य शरीर के स्वस्थ अंगों को कम से कम नुकसान पहुंचाते हुए कैंसर कोशिकाओं को मारना होता है। **कीमोथेरेपी का उपयोग कहाँ किया जाता है?** केमोथेरेपी का मुख्य उपयोग कैंसर के इलाज में किया जाता है। यह कैंसर के विभिन्न प्रकारों के लिए प्रभावी हो सकती है, जैसे: - स्तन कैंसर (Breast Cancer) - लंग कैंसर (Lung Cancer) - कोलोरेक्टल कैंसर (Colorectal Cancer) - ब्लड कैंसर (Leukemia) - लिंफोमा (Lymphoma) - ओवरी का कैंसर (Ovarian Cancer) इसके अलावा, कीमोथेरेपी का उपयोग कभी-कभी अन्य बीमारियों के उपचार में भी किया जा सकता है, जैसे कि कुछ प्रकार की रक्त की बीमारियाँ, जैसे ल्यूकेमिया और लिंफोमा। **Chemotherapy kaise hota hai? (केमोथेरेपी कैसे की जाती है?)** कीमोथेरेपी दवाइयाँ विभिन्न तरीकों से दी जा सकती हैं: _1. इंट्रावेनस (IV) तरीका_– इस तरीके में दवाइयाँ नसों में इंजेक्शन या ड्रिप के जरिए दी जाती हैं। यह सबसे सामान्य तरीका है। _2. दवाइयाँ ओरल (Mouth से)_ – कुछ दवाइयाँ टैबलेट या कैप्सूल के रूप में दी जाती हैं, जिन्हें मुँह से लिया जाता है। _3. इंजेक्शन के रूप में_ – कुछ दवाइयाँ शरीर में सीधे मांसपेशियों या अन्य स्थानों में इंजेक्ट की जाती हैं। _4. टॉपिकल (साधारण रूप से त्वचा पर)_ – कुछ मामलों में कीमोथेरेपी दवाइयाँ त्वचा पर लगाई जाती हैं, जैसे कि बाइल्स्किन कैंसर के इलाज में। **Chemotherapy kaise hota hai? (कीमोथेरेपी की प्रक्रिया)** कीमोथेरेपी की प्रक्रिया आमतौर पर एक योजना के तहत की जाती है। इसमें दवाइयों का कोर्स निर्धारित किया जाता है, जिसे "चक्र" या "साइकिल" कहा जाता है। एक चक्र में आमतौर पर कीमोथेरेपी की दवाइयाँ कुछ दिनों तक दी जाती हैं, और फिर शरीर को इलाज के प्रभावों से उबरने का समय दिया जाता है। इसके बाद अगला चक्र शुरू किया जाता है। हर चक्र में उपचार के बाद कुछ दिन आराम होता है, ताकि शरीर की कोशिकाएँ ठीक से काम कर सकें और स्वस्थ हो सकें। **Chemotherapy kitni baar de sakte hain? (कीमोथेरेपी का समय)** कीमोथेरेपी का समय और साइकिलें हर मरीज के लिए अलग-अलग हो सकती हैं। यह कैंसर के प्रकार, स्टेज, और मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है। सामान्यतः, एक कीमोथेरेपी साइकिल 2 से 4 सप्ताह तक होती है, और पूरा कोर्स 3 से 6 महीने तक चल सकता है। कुछ मामलों में यह समय और अधिक हो सकता है। डॉक्टर द्वारा इसको लेकर विशेष योजना बनाई जाती है। **chemotherapy ke side effects in hindi (कीमोथेरेपी के प्रभाव)** हालांकि कीमोथेरेपी के कुछ साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं, लेकिन आजकल की चिकित्सा तकनीक तेजी से विकसित हो रही है, और इन प्रभावों को नियंत्रित करना अब पहले से कहीं अधिक आसान है। इसलिए, कीमोथेरेपी से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह एक बेहद प्रभावी उपचार है, और आपको एक अनुभवी ऑन्कोलॉजिस्ट से परामर्श लेना चाहिए। साथ ही, [<u>BigOHealth ऐप</u>](https://play.google.com/store/apps/details?id=com.patients.bigohealth) से **सेकंड ओपिनियन** लेकर आप अपने इलाज को और अधिक आत्मविश्वास के साथ शुरू कर सकते हैं। चूँकि कीमोथेरेपी का मुख्य उद्देश्य कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करना है, और यह स्वस्थ कोशिकाओं को भी प्रभावित कर सकती है, इसलिए इसके कुछ सामान्य दुष्प्रभाव होते हैं। इनमें शामिल हैं: - वजन घटना और थकावट - बालों का झड़ना (Hair loss) - मतली और उल्टी - संक्रमण के खतरे में वृद्धि - मुँह और गले में घाव - त्वचा में सूजन और लालपन - पेट की परेशानी जैसे दस्त या कब्ज इन प्रभावों को कम करने के लिए डॉक्टर के द्वारा उपचार किया जाता है। कभी-कभी, दवाइयाँ या सप्लीमेंट्स दी जाती हैं, जो कीमोथेरेपी के दुष्प्रभावों को कम करने में मदद करती हैं। **क्या कीमोथेरेपी हमेशा प्रभावी होती है?** कीमोथेरेपी कैंसर के इलाज के लिए उपलब्ध **सबसे प्रभावी उपचार विकल्पों में से एक है** और इसे डॉक्टरों द्वारा कई सालों से सफलतापूर्वक उपयोग किया जा रहा है। हालांकि, हर व्यक्ति की प्रतिक्रिया अलग हो सकती है, लेकिन यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि कीमोथेरेपी कैंसर कोशिकाओं को मारने और ट्यूमर को सिकोड़ने में मदद करती है, जिससे इलाज के परिणामों में सुधार होता है। कीमोथेरेपी से डरने की कोई बात नहीं है। यह उपचार कैंसर के खिलाफ एक शक्तिशाली औजार है और इसे डॉक्टरों की देखरेख में सुरक्षित रूप से किया जाता है। अगर आपको कीमोथेरेपी की सलाह दी जाती है, तो यह आपके इलाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। **इससे डरने की बजाय, इसका सकारात्मक प्रभाव समझना ज़रूरी है**, क्योंकि यह कई मामलों में कैंसर से जंग जीतने में मदद करता है। अंततः, हर मरीज का इलाज व्यक्तिगत रूप से किया जाता है और डॉक्टर की सलाह के अनुसार यह सबसे अच्छा उपचार विकल्प हो सकता है।
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What is multidisciplinary tumor board?

Dr. Pranati Narayan

01 Mar, 2025

What Is Multidisciplinary Tumor Board?

### Conclusion In cancer hospitals, a tumor board is a key part of making important decisions about cancer treatment. By working together, a team of specialists creates personalized treatment plans that help patients get the best care. Tumor boards ensure that the treatment is well-organized, effective, and up to date with the latest medical knowledge. This team approach helps improve outcomes for cancer patients and ensures they receive the best care possible. ### What is tumor board? A tumor board is a meeting where doctors and other healthcare experts come together to discuss the best way to treat patients with cancer. These meetings are common in cancer hospitals and are very important in providing the best care for patients with cancer. ### 1. Group of Experts Discusses the Case At a tumor board meeting, the team looks at the patient’s medical information. This includes test results, scans like CT or MRI images or PET CT, and biopsy reports (samples of tissue). The team looks at details like the type of cancer, its stage, and how it might behave, as well as the patient’s overall health. ### 2. Reviewing the Patient’s Information One of the main goals of a tumor board is to create a treatment plan that’s tailored to each patient. Because every cancer is different, the board members work together to recommend the best treatment based on the patient’s specific situation. This can include surgery, chemotherapy, radiation, or newer treatments like immunotherapy. ### 3. Creating a Personal Treatment Plan One of the main goals of a tumor board is to create a treatment plan that’s tailored to each patient. Because every cancer is different, the board members work together to recommend the best treatment based on the patient’s specific situation. This can include surgery, chemotherapy, radiation, or newer treatments like immunotherapy. ### 4. Making Sure Treatments Work Together Cancer treatment often involves a mix of treatments, such as surgery, chemotherapy, and radiation. The tumor board helps make sure all these treatments are planned in the right order and work together smoothly, so the patient gets the best care possible without any treatments conflicting with each other. ### 5. Providing Expert Advice Sometimes, cancer cases are complicated or unusual. The tumor board gives the patient a chance to get advice from a group of specialists, which can help identify the most effective treatment options. This is especially helpful for rare cancers or difficult cases where expert input is needed to find the best solution. ### 6. Improving Outcomes for Patients The main goal of a tumor board is to help patients get the best results from their treatment. By bringing together a team of experts, cancer hospitals ensure that all aspects of the cancer are carefully looked at. This leads to better treatment choices, which can improve the chances of recovery and overall quality of life for patients. ### 7. Learning and Sharing Knowledge Tumor board meetings also allow doctors and healthcare providers to learn from each other. They discuss the latest research, new treatments, and different ways to manage cancer. This helps the entire team stay updated and improves the quality of care for all patients. Are you looking for a multi-disciplinary tumor board consultation? Reach out to BigOHealth - where we have India's leading oncologists part of our tumor board.
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Tumor Board in Oncology

Dr. Pranati Narayan

01 Mar, 2025

Tumor Board In Oncology

### Conclusion A tumor board is an essential part of cancer care in modern times. It is a space where healthcare professionals from different specialties collaborate to provide the **best possible treatment for patients with cancer**. By reviewing cases in detail, discussing the latest treatment options, and **creating personalized care plans**, tumor boards improve the chances of successful outcomes for cancer patients. This collaborative approach ensures that all aspects of the patient's care are taken into account, leading to better, more coordinated treatment and a higher quality of care. ### Tumor Coard Definition A tumor board is a specialized meeting where a group of healthcare professionals, including oncologists, radiologists, pathologists, surgeons, and other experts, come together to discuss complex cancer cases. The goal of a tumor board is to provide a comprehensive evaluation of a patient's condition and to recommend the most effective treatment options. ### Who is part of oncology tumor board? **The team usually includes:** - **Medical Oncologists** – Doctors who specialize in the treatment of cancer using chemotherapy, targeted therapies, and immunotherapy. - **Onco Surgeons** – Specialists in performing surgeries to remove tumors or perform biopsies. - **Radiologists** – Experts who analyze imaging tests such as CT scans, MRIs, and X-rays to understand the extent of the cancer. - **Pathologists** – Doctors who examine tissue samples (biopsies) to identify the type and characteristics of the cancer. - **Radiation Oncologists** – Specialists in treating cancer with radiation therapy. - **Nurses, Genetic Counselors, and Other Specialists** – These healthcare providers may also be part of the tumor board, depending on the patient's needs. ### How Does a Tumor Board Work? Tumor board meetings are typically held on a regular basis, such as weekly or bi-weekly, depending on the hospital’s size and the number of cases. These meetings often involve the following steps: 1. **Review of Medical Information**: Each case is thoroughly reviewed, including the patient’s medical history, diagnostic imaging, pathology reports, lab results, and any other relevant tests. 2. **Discussion of Treatment Options**: The team members discuss different treatment options, considering the type, stage, and location of the cancer. They may also discuss experimental treatments or clinical trials available to the patient. 3. **Development of a Personalized Plan**: The tumor board aims to create a personalized treatment plan that best suits the patient’s condition, preferences, and overall health. This plan may include a combination of surgery, chemotherapy, radiation therapy, or other treatments, tailored to the patient’s specific needs. 4. **Ongoing Adjustments**: Tumor boards don’t just discuss new cases; they also regularly review ongoing cases. If the patient's condition changes or new information becomes available, the treatment plan may be adjusted to reflect the latest findings. ### Importance of Tumor Boards Important in Oncology 1. **Collaborative Decision Making**: Cancer treatment is complex and involves multiple types of care. By having a diverse team of specialists discuss each case, tumor boards ensure that no aspect of the patient's care is overlooked. This collaboration often leads to more accurate diagnoses and more effective treatment plans. 2. **Improved Treatment Outcomes**: The tumor board ensures that each patient receives the best possible care. By bringing together expertise from various fields, the team can consider all available treatment options, improving the chances of better outcomes for patients. 3. **Personalized Care**: Every cancer case is unique, and a tumor board helps develop a treatment plan tailored to the individual patient. The team takes into account not only the type of cancer but also factors like the patient's age, general health, and preferences, ensuring a holistic approach to care. 4. **Access to the Latest Treatments**: Tumor boards often discuss new therapies and clinical trials, giving patients access to the latest advancements in cancer treatment. For patients with rare or hard-to-treat cancers, this can open doors to new and potentially life-saving options. 5. **Comprehensive Review**: In some cases, a patient's diagnosis might be unclear or difficult to treat. Tumor boards offer an opportunity for multiple experts to examine the case from different angles, ensuring that the right diagnosis and treatment plan are reached. This comprehensive review is crucial for complex or rare cancers. 6. **Ongoing Education and Learning**: Tumor boards provide a forum for doctors and specialists to learn from each other. This knowledge-sharing helps ensure that the team stays updated on the latest research, treatment options, and clinical practices, ultimately improving patient care. ### Types of Tumor Boards 1. General Tumor Boards: These boards discuss a wide variety of cancer types, from breast cancer to lung cancer to gastrointestinal cancers. They are often held in large hospitals or cancer centers where many types of cancers are treated. 2. Specialized Tumor Boards: Specialized boards allow for a more focused discussion and bring together experts who specialize in particular cancer types. Some cancer hospitals have tumor boards focused on specific types of cancer, such as: - Breast Cancer Tumor Boards, Lung Cancer Tumor Boards, Gastrointestinal Cancer Tumor Boards, Sarcoma Tumor Boards etc. 3. Multidisciplinary Tumor Boards: These are boards that combine several areas of expertise, such as surgery, radiology, and medical oncology. They are designed to provide a comprehensive evaluation of each case by involving all aspects of treatment, from diagnosis to follow-up care. BigOHealth is one of the leading providers of Multidisciplinary tumor board in India. Tumor boards play a vital role in modern oncology, as they ensure that all aspects of cancer care, such as surgery, chemotherapy, radiation therapy, and emerging treatments, are considered and coordinated. By involving experts from various specialties, tumor boards improve decision-making and the overall quality of care, helping to achieve the best possible outcomes for patients. **Are you looking for a multi-disciplinary tumor board consultation?** Reach out to BigOHealth - where we have India's leading oncologists part of our tumor board.
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What is a Virtual Tumor Board?

Dr. Pranati Narayan

01 Mar, 2025

What Is A Virtual Tumor Board?

### Conclusion A virtual tumor board is a powerful tool that brings together **cancer specialists to collaborate on the care of patients, all while breaking down geographical barriers**. By offering increased access to expertise, flexibility, and the ability to incorporate the latest research, virtual tumor boards enhance the quality of care patients receive, particularly for those in underserved areas. While there are challenges related to technology and data security, the benefits of this innovative approach to cancer care far outweigh the limitations. As technology continues to advance, **virtual tumor boards are likely to become an even more integral part of the cancer treatment process**, ensuring that all patients have access to the best possible care, no matter where they live. ### What is the Purpose of a Virtual Tumor Board? The purpose of a virtual tumor board is the same as a traditional tumor board: to bring together a group of specialists to discuss and develop a personalized treatment plan for cancer patients. However, **unlike traditional tumor boards, which typically require the physical presence of all team members, a virtual tumor board allows for remote participation.** This virtual setup helps ensure that more patients benefit from multidisciplinary care, even if the specialists are located in different regions or the healthcare facility is geographically spread out. ### Key Benefits of Virtual Tumor Boards 1. **Increased Access to Expertise**: One of the main advantages of virtual tumor boards is the ability to bring together a wider range of experts from different locations. For example, a cancer hospital in a rural area can consult with specialists from larger, more centralized hospitals or cancer centers. This broader access to experts allows for better-informed decision-making, which is especially important for complex or rare cancers. 2. **Convenience and Flexibility**: Virtual tumor boards can be held at scheduled times without requiring everyone to be physically present in the same location. Specialists can join the meeting from their office, home, or hospital room, saving time and travel costs. This flexibility can be especially helpful for hospitals in remote locations or those with busy schedules, as it allows for timely discussions and treatment planning. 3. **Improved Collaboration**: Virtual platforms often come with tools that make collaboration easier, such as shared digital files, real-time note-taking, and secure messaging. This allows the entire team to review medical records, diagnostic images, and pathology results simultaneously and share their insights immediately. By streamlining communication, virtual tumor boards promote quicker decision-making and reduce the chances of miscommunication. 4. **Cost-Effectiveness**: Traditional in-person tumor board meetings often involve travel expenses, especially when specialists must come from different locations. Virtual tumor boards eliminate the need for travel, making it a more cost-effective option for hospitals and healthcare professionals. These savings can be redirected to other areas of patient care. 5. **Patient-Centered Care**: Virtual tumor boards help ensure that patients have access to a wide range of experts, no matter where they live. This can be particularly beneficial for patients in rural or underserved areas who might not have easy access to top cancer specialists. By facilitating remote participation, virtual tumor boards make it possible for patients to receive comprehensive, expert-driven care without the logistical burden of traveling long distances. 6. **Access to Latest Technology and Research**: Virtual tumor boards are often connected to larger networks of hospitals, academic centers, and research organizations. This means that specialists can discuss the latest advancements in cancer treatment, including emerging therapies and clinical trials, that may not yet be available locally. This ensures that patients receive the most up-to-date care based on the latest research and evidence. ### How Does Virtual Tumor Board Work? The process of running a virtual tumor board is similar to that of a traditional tumor board, with a few key differences due to the online format. Here's a breakdown of how it typically works: 1. **Case Preparation**: The patient's medical records, diagnostic images (such as CT or MRI scans), pathology reports, and any other relevant test results are uploaded to a secure digital platform ahead of time. The healthcare team reviews the information before the meeting so they can discuss it thoroughly during the virtual session. 2. **Virtual Meeting**: At the scheduled time, the team of specialists joins the virtual tumor board through a video conference platform. Each team member reviews their area of expertise: the oncologist may discuss treatment options, the surgeon may consider the possibility of surgery, the radiologist will present imaging results, and the pathologist will provide insights into the tumor’s type and grade. The meeting can take place using video conferencing tools like Zoom, Microsoft Teams, or telemedicine-specific platforms. These platforms are often HIPAA-compliant (Health Insurance Portability and Accountability Act) to ensure that patient information is kept secure and confidential. 3. **Collaboration and Discussion**: During the virtual tumor board, specialists collaborate by sharing their opinions and making treatment recommendations based on their expertise. The digital platform allows the team to share images, scan results, and pathology reports in real-time. Discussions are documented, and action items are recorded for further follow-up. 4. **Treatment Planning**: Based on the collective input, the team develops a treatment plan tailored to the patient's specific needs. This may include a combination of surgery, chemotherapy, radiation therapy, or targeted therapies. If needed, recommendations for clinical trials or experimental treatments may also be considered. 5. **Follow-Up**: After the tumor board meeting, the treatment plan is communicated to the patient. If any further information or adjustments are needed, the team can continue to collaborate online until the best treatment approach is established. ### Who Participates in a Virtual Tumor Board? Just like in a traditional tumor board, the virtual tumor board is composed of various specialists in oncology, including: - **Medical Oncologists**: Experts in cancer treatment with chemotherapy, immunotherapy, and other drug-based therapies. - **Onco Surgeons**: Specialists who assess whether surgical intervention is needed to remove tumors or perform biopsies. - **Radiologists**: Doctors who review imaging results and help determine the stage of the cancer. - **Pathologists**: Specialists who examine tissue samples and determine the cancer’s type and grade. - **Radiation Oncologists**: Experts in the use of radiation therapy for cancer treatment. - **Genetic Counselors**: Specialists who analyze genetic testing and advise on targeted therapies. - **Nurses, Pharmacists, and Support Staff**: Provide additional input, offer patient education, and discuss medication-related concerns. In some cases, experts from other fields, such as **palliative care specialists**, nutritionists, and psychologists, may also participate, depending on the patient's specific needs. ### Why choose BigOHealth's Virtual Tumor Board? 1. **Experienced Doctors**: our virtual tumor board consists of doctors with more than 20 years of experience. 2. **Multi-disciplinary**: our virtual tumor board is multi disciplinary by design which caters to patients with all kinds of cancer treatment. 3. **Instant connect:** our care coordinator reaches out **within 60 minutes** of your query. 4. **Cost effective**: our virtual tumor board is one of the most cost effective boards in India. 5. **Dedicated care team**: our care coordinator is avaialable for all kinds of services (even beyond tumor board consultations). Are you looking for a **multi-disciplinary tumor board consultation**? Reach out to BigOHealth - where we have India's leading oncologists part of our tumor board.
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Brain tumor ke lakshan in Hindi

Dr. Pranati Narayan

01 Mar, 2025

Brain Tumor Ke Lakshan In Hindi

ब्रेन ट्यूमर एक गंभीर लेकिन पहचाने जाने योग्य स्थिति है। यदि किसी को लगातार सिरदर्द, उल्टी, दृष्टि संबंधी दिक्कतें, संतुलन की समस्या, दौरे या व्यवहार में बदलाव महसूस हो रहे हैं, तो इसे अनदेखा न करें। समय पर डॉक्टर से संपर्क करके सही जांच और उपचार करवाना जरूरी है। आप BigOHealth के जरिए अनुभवी न्यूरोसर्जन से परामर्श ले सकते हैं। समय पर सही चिकित्सकीय सहायता लेने से बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है और बेहतर जीवन की संभावना बढ़ती है। ### ब्रेन ट्यूमर क्या है? ब्रेन ट्यूमर मस्तिष्क में असामान्य कोशिकाओं के असामान्य वृद्धि के कारण बनने वाली एक गंभीर स्थिति है। यह ट्यूमर कैंसरयुक्त (मेलिग्नेंट) और गैर-कैंसरयुक्त (बिनाइन) हो सकते हैं। हालांकि हर ब्रेन ट्यूमर खतरनाक नहीं होता, लेकिन यह मस्तिष्क के कार्यों पर असर डाल सकता है और जीवन के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है। ब्रेन ट्यूमर के लक्षणों की पहचान जल्दी होने से समय पर इलाज संभव हो सकता है, जिससे जटिलताओं से बचा जा सकता है। यह लेख आपको ब्रेन ट्यूमर के प्रमुख लक्षणों, उनके कारणों और सही समय पर चिकित्सा परामर्श की आवश्यकता के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करेगा। ### ब्रेन ट्यूमर के सामान्य लक्षण | Brain tumor symptoms in Hindi ब्रेन ट्यूमर के लक्षण उसके प्रकार, आकार और मस्तिष्क के किस हिस्से में मौजूद है, इस पर निर्भर करते हैं। हालांकि, कुछ सामान्य लक्षण होते हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। 1. **लगातार सिरदर्द** - ब्रेन ट्यूमर के सबसे प्रारंभिक और प्रमुख लक्षणों में सिरदर्द शामिल है। - यह सामान्य सिरदर्द से अलग होता है और समय के साथ गंभीर होता जाता है। - यह अक्सर सुबह के समय अधिक महसूस होता है और कभी-कभी दर्द निवारक दवाओं से भी ठीक नहीं होता। सिरदर्द झुकने, खांसने या छींकने से भी बढ़ सकता है। 2. **मिचली (Nausea) और उल्टी (Vomiting)** - बिना किसी स्पष्ट कारण के बार-बार मिचली या उल्टी आना ब्रेन ट्यूमर का संकेत हो सकता है। - यह लक्षण विशेष रूप से सुबह के समय अधिक स्पष्ट हो सकता है। - लगातार उल्टी आना मस्तिष्क में दबाव बढ़ने का संकेत हो सकता है। 3. **दृष्टि में बदलाव (Visual Disturbances)** - यदि आपको धुंधली दृष्टि, दोहरी दृष्टि (Diplopia) या अचानक दृष्टि खोने जैसी समस्या हो रही है, तो यह ब्रेन ट्यूमर के कारण हो सकता है। - कुछ मामलों में, दृष्टि धीरे-धीरे कमजोर होती जाती है, जिससे व्यक्ति को एहसास नहीं होता कि उसकी नजर प्रभावित हो रही है। - देखने के क्षेत्र में किसी हिस्से का गायब हो जाना (Tunnel Vision) भी एक संभावित लक्षण हो सकता है। 4. **संतुलन और समन्वय में कठिनाई (Balance & Coordination Issues)** - चलने में कठिनाई या बार-बार गिरना ब्रेन ट्यूमर का संकेत हो सकता है, खासकर जब यह सेरिबेलम (Cerebellum) को प्रभावित करता है। - हाथों और पैरों में कंपन या सुन्नता भी संतुलन प्रभावित कर सकता है। - गतिविधियों जैसे लिखना, कपड़े पहनना या अन्य रोजमर्रा के काम करने में कठिनाई हो सकती है। 5. **व्यक्तित्व और व्यवहार में परिवर्तन (Personality & Mood Changes)** - ब्रेन ट्यूमर मानसिक और भावनात्मक परिवर्तन का कारण बन सकता है। - व्यक्ति चिड़चिड़ा, अवसादग्रस्त या अत्यधिक आक्रामक हो सकता है। - एकाग्रता में कमी, याददाश्त कमजोर होना या निर्णय लेने में कठिनाई भी देखी जा सकती है। 6. **बोलने और सुनने में समस्या (Speech & Hearing Issues)** - कुछ मामलों में, ब्रेन ट्यूमर की वजह से बोलने में कठिनाई हो सकती है। - व्यक्ति को शब्दों को सही ढंग से बोलने या समझने में परेशानी हो सकती है। - कानों में घंटी बजना (Tinnitus) या सुनाई देने की क्षमता में कमी भी हो सकती है। 7. **दौरे (Seizures)** - अचानक झटके या बेहोशी के दौरे ब्रेन ट्यूमर के प्रमुख लक्षणों में से एक हैं। - यह दौरे पूरे शरीर में हो सकते हैं या केवल किसी विशेष अंग तक सीमित हो सकते हैं। - ट्यूमर मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि को प्रभावित करता है, जिससे दौरे पड़ सकते हैं। 8. **याददाश्त की समस्या और मानसिक भ्रम (Memory Problems & Cognitive Issues)** - व्यक्ति छोटी-छोटी चीजें भूल सकता है या बातें याद रखने में परेशानी हो सकती है। - जटिल कार्यों को करने में कठिनाई हो सकती है, जैसे कि पैसे का हिसाब रखना या निर्णय लेना। - कभी-कभी व्यक्ति को समय और स्थान की पहचान करने में भी दिक्कत हो सकती है। ### ब्रेन ट्यूमर के संभावित कारण और जोखिम कारक **हालांकि ब्रेन ट्यूमर के सटीक कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं**, लेकिन कुछ कारक इसके जोखिम को बढ़ा सकते हैं: - **आनुवंशिकता (Genetics)**: यदि परिवार में किसी को ब्रेन ट्यूमर हुआ है, तो इसकी संभावना बढ़ सकती है। - **रेडिएशन एक्सपोजर (Radiation Exposure)**: हाई-रेडिएशन वाली जगहों पर काम करने या रेडिएशन थेरेपी लेने से इसका खतरा बढ़ सकता है। - **इम्यून सिस्टम की गड़बड़ी (Immune System Disorders)**: कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों में ब्रेन ट्यूमर का जोखिम अधिक होता है। - **रसायनों के संपर्क में आना**: कुछ औद्योगिक केमिकल्स के संपर्क में आने से ब्रेन ट्यूमर का खतरा बढ़ सकता है। ### कब डॉक्टर से संपर्क करें? निम्न स्थितियों में BigOHealth के माध्यम से भारत के सर्वश्रेष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह लें– - यदि आपको ऊपर बताए गए लक्षण लगातार हो रहे हैं, तो जल्द से जल्द किसी न्यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करें। - लक्षणों की गंभीरता बढ़ रही हो। - सिरदर्द जो दवाओं से ठीक नहीं हो रहा हो। - अचानक दौरे पड़ने लगे हों। - संतुलन, दृष्टि या सुनने की समस्याएं लगातार बनी रहें।
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Breast cancer ke lakshan in Hindi

Dr. Pranati Narayan

08 Mar, 2025

Breast Cancer Ke Lakshan In Hindi

ब्रेस्ट कैंसर के लक्षणों का पता जल्दी चलना और सही समय पर इलाज करवाना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यदि किसी महिला को ऊपर बताए गए लक्षणों जैसे स्तन में गांठ, निप्पल से डिस्चार्ज, आकस्मिक वजन घटाना आदि में से कोई भी लक्षण महसूस होता है, तो उसे तुरंत डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए। सभी महिलाओं को नियमित रूप से ब्रेस्ट आत्म परीक्षण (Breast Self-Examination) और समय-समय पर चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए, ताकि किसी भी असामान्य बदलाव का जल्दी पता चल सके। इससे ब्रेस्ट कैंसर का जल्दी पता चलने और इलाज में सफलता की संभावना बढ़ जाती है। ### ब्रेस्ट कैंसर क्या है? | Breast cancer kya hai? ब्रेस्ट कैंसर (Breast Cancer) स्तन (ब्रेस्ट) के ऊतकों में उत्पन्न होने वाली एक प्रकार की कैंसर है। यह कैंसर मुख्य रूप से स्तन के दूध बनाने वाली ग्रंथियों (lobules) या स्तन के नलिकाओं (ducts) से उत्पन्न होता है। ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती लक्षण अक्सर बहुत स्पष्ट नहीं होते, लेकिन जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, इसके लक्षण स्पष्ट हो सकते हैं। ### स्तन कैंसर के लक्षण | Breast cancer symptoms in Hindi स्तन कैंसर के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हो सकते हैं - 1. **स्तन में गांठ (Lump in the Breast)** ब्रेस्ट कैंसर का सबसे आम और पहला लक्षण स्तन में एक गांठ (लम्प) का महसूस होना होता है। यह गांठ स्तन के किसी भी हिस्से में हो सकती है और यह आमतौर पर कठोर और असमान आकार की होती है। अगर गांठ में दर्द नहीं होता है तो यह विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हो सकता है। 2. **स्तन के आकार या रूप में बदलाव (Change in Size or Shape of the Breast)** ब्रेस्ट कैंसर के कारण स्तन का आकार और रूप बदल सकता है। स्तन अचानक सिकुड़ सकता है या उसका आकार बढ़ सकता है। कभी-कभी एक स्तन दूसरे से अधिक भारी या ऊँचा दिख सकता है। 3. **निप्पल से डिस्चार्ज (Discharge from Nipple)** निप्पल से खून, पानी, या पीले रंग का डिस्चार्ज होना भी ब्रेस्ट कैंसर का लक्षण हो सकता है। यदि यह डिस्चार्ज बिना किसी स्पष्ट कारण के हो, तो यह कैंसर का संकेत हो सकता है। 4. **निप्पल का अंदर की ओर धंसना (Inward Turning of Nipple)** ब्रेस्ट कैंसर के कारण निप्पल अंदर की ओर धंस सकता है या उसकी दिशा बदल सकती है। यह लक्षण ब्रेस्ट के अंदर के ऊतकों में बदलाव के कारण हो सकता है। 5. **स्तन की त्वचा में परिवर्तन (Change in the Skin of the Breast)** ब्रेस्ट कैंसर के कारण स्तन की त्वचा पर खिंचाव, दाने, लालिमा या पीलापन दिखाई दे सकता है। कभी-कभी स्तन की त्वचा की सतह रेशमी या नारंगी छिलके जैसी दिख सकती है, जिसे "पिउरिए डॉरन" (Peau d'orange) कहा जाता है। 6. **स्तन में दर्द या संवेदनशीलता (Pain or Tenderness in the Breast)** हालांकि ब्रेस्ट कैंसर के दौरान स्तन में दर्द सामान्य नहीं होता है, लेकिन कभी-कभी दर्द या संवेदनशीलता महसूस हो सकती है। यदि दर्द अचानक हो और उसका कारण स्पष्ट न हो, तो यह कैंसर का संकेत हो सकता है। 7. **हड्डियों में दर्द (Pain in Bones)** यदि कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों में फैल चुका है, तो हड्डियों में दर्द महसूस हो सकता है, खासकर रीढ़, हड्डियों या जोड़ों में। 8. **आकस्मिक वजन घटाना (Unexplained Weight Loss)** कैंसर के कारण शरीर में वजन घटने की समस्या हो सकती है, खासकर जब कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों में फैलने लगता है। 9. **लिंफ नोड्स में सूजन (Swelling of Lymph Nodes)** ब्रेस्ट कैंसर के कारण लिंफ नोड्स (गांठों) में सूजन आ सकती है, खासकर बांह के नीचे या गर्दन में। यह सूजन आमतौर पर बिना दर्द के होती है, लेकिन यह कैंसर के फैलने का संकेत हो सकती है। 10. **आंतरिक सूजन या जलन (Internal Swelling or Inflammation)** कभी-कभी ब्रेस्ट कैंसर के कारण स्तन के अंदर सूजन या जलन हो सकती है। यह लक्षण अन्य बीमारियों के समान हो सकते हैं, लेकिन यदि सूजन लगातार बनी रहे तो यह कैंसर का संकेत हो सकता है। 11. **शरीर में थकावट (Fatigue)** ब्रेस्ट कैंसर के कुछ मामलों में शरीर में अत्यधिक थकावट महसूस हो सकती है, खासकर अगर कैंसर का फैलाव हो चुका हो। इस स्थिति को अनदेखा नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है। 12. **स्तन में खुजली (Itching in the Breast)** कभी-कभी ब्रेस्ट कैंसर के कारण स्तन में खुजली या जलन हो सकती है, हालांकि यह लक्षण बहुत सामान्य नहीं है। यह मुख्य रूप से त्वचा में बदलाव के कारण हो सकता है, जैसे कि सूजन या इन्फ्लेमेशन। कृपया ध्यान दें कि ऊपर बताए गए **कुछ लक्षण अन्य बीमारियों के भी संकेत हो सकते हैं**, लेकिन **महत्वपूर्ण बात** यह है कि आपको इन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और अपने डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए।
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Radiation Meaning in Hindi

Dr. Pranati Narayan

24 Feb, 2026

Radiation Meaning In Hindi

कैंसर का नाम सुनते ही मन में कई सवाल उठते हैं — इलाज कैसे होगा, दर्द होगा या नहीं, कितना समय लगेगा? इन्हीं सवालों का जवाब देने के लिए यह लेख लिखा गया है। विकिरण चिकित्सा (रेडिएशन थेरेपी) कैंसर के सबसे प्रभावी और आमतौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले उपचारों में से एक है। यहाँ हम सरल भाषा में समझेंगे कि रेडिएशन थेरेपी क्या है, यह कैसे काम करती है, इसके प्रकार क्या हैं और इससे क्या साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं। **रेडिएशन थेरेपी क्या है? | Radiation Therapy Kya Hai?** रेडिएशन थेरेपी एक चिकित्सीय उपचार है जिसमें उच्च-ऊर्जा विकिरण किरणें (जैसे एक्स-रे, गामा किरणें या प्रोटॉन) शरीर के प्रभावित हिस्से पर केंद्रित की जाती हैं ताकि कैंसर कोशिकाओं के डीएनए को नुकसान पहुँचाकर उन्हें नष्ट किया जा सके या उनकी वृद्धि रोकी जा सके। यह उपचार आमतौर पर तब दिया जाता है जब कैंसर किसी एक स्थान तक सीमित हो या उसे स्थानीय रूप से नियंत्रित करना हो। **रेडिएशन थेरेपी किस उद्देश्य से दी जाती है? | Radiation Therapy Ka Uddeshya** रेडिएशन थेरेपी का उपयोग तीन मुख्य उद्देश्यों के लिए किया जाता है। इसका लक्ष्य केवल कैंसर को खत्म करना नहीं, बल्कि मरीज की जीवन गुणवत्ता को बेहतर बनाना भी है। _1. ट्यूमर का आकार घटाना (Neoadjuvant / Pre-surgical Therapy)_ सर्जरी से पहले ट्यूमर को छोटा किया जाता है ताकि ऑपरेशन आसान हो और स्वस्थ ऊतकों को कम नुकसान पहुँचे। रेक्टल कैंसर और ग्रासनली (Esophageal) कैंसर में यह तरीका आम है। कई बार रेडिएशन को कीमोथेरेपी के साथ मिलाकर दिया जाता है। _2. कैंसर कोशिकाओं को पूरी तरह नष्ट करना (Curative Intent)_ जब कैंसर शुरुआती या मध्य चरण में हो और एक ही स्थान तक सीमित हो, तो रेडिएशन थेरेपी का उद्देश्य कैंसर को जड़ से खत्म करना होता है। प्रोस्टेट कैंसर, गले का कैंसर (Laryngeal Cancer) और सर्वाइकल कैंसर में यह एक मुख्य उपचार विकल्प है। _3. लक्षणों से राहत देना (Palliative Radiation Therapy)_ जब कैंसर शरीर के कई हिस्सों में फैल चुका हो और पूरी तरह ठीक करना संभव न हो, तब रेडिएशन दर्द, सूजन, ब्लीडिंग और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं को कम करने के लिए दी जाती है — इसे पैलिएटिव केयर कहते हैं। उदाहरण के लिए, हड्डियों में दर्द, ब्रेन मेटास्टेसिस, या गर्भाशय से ब्लीडिंग में यह बेहद असरदार है। **रेडिएशन थेरेपी के प्रकार क्या हैं? | Radiation Therapy Ke Prakar** रेडिएशन थेरेपी के दो प्रमुख प्रकार हैं: - बाहरी बीम रेडिएशन थेरेपी (External Beam Radiation Therapy - EBRT) - आंतरिक रेडिएशन थेरेपी (Internal Radiation Therapy या ब्रैकीथेरेपी) **बाहरी बीम रेडिएशन थेरेपी (EBRT) क्या है? | EBRT Kya Hai?** EBRT सबसे आम और व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली रेडिएशन थेरेपी है। इसमें शरीर के बाहर एक मशीन से रेडिएशन किरणें कैंसर के स्थान पर भेजी जाती हैं। यह पूरी तरह गैर-आक्रामक (non-invasive) प्रक्रिया है — शरीर के अंदर कुछ नहीं डाला जाता। _यह कैसे काम करती है:_ मरीज एक उपचार टेबल पर लेटते हैं। Linear Accelerator नामक मशीन शरीर के चारों ओर घूमकर अलग-अलग कोणों से रेडिएशन भेजती है। कंप्यूटर और इमेजिंग तकनीक यह सुनिश्चित करती है कि रेडिएशन केवल ट्यूमर को टार्गेट करे और स्वस्थ ऊतक सुरक्षित रहें। _EBRT के उप-प्रकार:_ - **3D कन्फॉर्मल रेडिएशन थेरेपी (3D-CRT):** ट्यूमर के आकार के अनुसार 3D इमेजिंग के जरिए किरणों को ढाला जाता है। - **इंटेंसिटी-मॉडुलेटेड रेडिएशन थेरेपी (IMRT):** रेडिएशन की तीव्रता को आवश्यकता अनुसार समायोजित किया जाता है — स्वस्थ ऊतकों को और कम नुकसान होता है। - **इमेज-गाइडेड रेडिएशन थेरेपी (IGRT):** उपचार से पहले और दौरान इमेजिंग का उपयोग सटीकता बढ़ाने के लिए किया जाता है। - **स्टेरियोटैक्टिक रेडियोसर्जरी (SRS) / SBRT:** कुछ ही सत्रों में बहुत अधिक खुराक दी जाती है। मस्तिष्क, फेफड़े, लिवर और रीढ़ जैसे संवेदनशील हिस्सों के लिए उपयुक्त। - **प्रोटॉन थेरेपी:** एक्स-रे की जगह प्रोटॉन किरणों का इस्तेमाल। रेडिएशन सीधे ट्यूमर में जाकर रुकता है, जिससे आसपास के ऊतकों को न्यूनतम नुकसान होता है। _EBRT किन कैंसर में दी जाती है:_ - स्तन कैंसर - प्रोस्टेट कैंसर - फेफड़े, मस्तिष्क, सिर-गर्दन और मलाशय के कैंसर - अक्सर सर्जरी या कीमोथेरेपी के साथ मिलाकर दी जाती है **ब्रैकीथेरेपी (Brachytherapy) क्या है? | Brachytherapy Kya Hoti Hai?** ब्रैकीथेरेपी एक आंतरिक रेडिएशन थेरेपी है जिसमें रेडियोधर्मी स्रोत को शरीर के अंदर, सीधे ट्यूमर के पास या भीतर रखा जाता है। इसका नाम ग्रीक शब्द "Brachy" (यानी "निकट") से आया है। इससे रेडिएशन सीधे कैंसर पर असर करता है और स्वस्थ अंगों पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है। _यह कैसे दी जाती है:_ छोटे-छोटे रेडियोधर्मी बीज (seeds), तार (wires) या ट्यूब (catheters) ट्यूमर के पास रखे जाते हैं। इन्हें अस्थायी या स्थायी रूप से शरीर में रखा जा सकता है। CT स्कैन, MRI या अल्ट्रासाउंड की मदद से इसे सटीक तरीके से किया जाता है। _ब्रैकीथेरेपी के प्रकार:_ - **अस्थायी ब्रैकीथेरेपी:** रेडियोधर्मी स्रोत कुछ समय के लिए रखा जाता है और फिर हटा लिया जाता है। Low-Dose Rate (LDR) में धीरे-धीरे कई घंटों/दिनों में रेडिएशन मिलती है, जबकि High-Dose Rate (HDR) में कुछ मिनटों में तेज़ खुराक दी जाती है। - **स्थायी ब्रैकीथेरेपी (Seed Implants):** रेडियोधर्मी बीज ट्यूमर में स्थायी रूप से डाल दिए जाते हैं। ये कुछ हफ्तों में निष्क्रिय हो जाते हैं और शरीर को नुकसान नहीं पहुँचाते। मुख्यतः प्रोस्टेट कैंसर में उपयोग किया जाता है। _ब्रैकीथेरेपी किन कैंसर में होती है:_ - प्रोस्टेट कैंसर - सर्विक्स (गर्भाशय ग्रीवा) और गर्भाशय कैंसर - स्तन और योनि का कैंसर - फेफड़े और ग्रासनली का कैंसर (कुछ मामलों में) - सिर और गर्दन के कैंसर **रेडिएशन थेरेपी के दौरान क्या होता है? | Radiation Therapy Ki Prakriya** इलाज शुरू होने से पहले डॉक्टर, मरीज की स्थिति के आधार पर रेडिएशन की डोज़ और दिशा तय करते हैं। _1. प्लानिंग और सिमुलेशन:_ विशेष CT स्कैन और इमेजिंग तकनीकों की मदद से ट्यूमर की सटीक स्थिति मैप की जाती है ताकि रेडिएशन सही स्थान पर और सही मात्रा में पहुँचे। _2. उपचार सत्र (Treatment Sessions):_ रेडिएशन थेरेपी आमतौर पर हफ्ते में 5 दिन दी जाती है। प्रत्येक सत्र में वास्तविक रेडिएशन डिलीवरी 1-2 मिनट की होती है, लेकिन सेटअप और पोजिशनिंग को मिलाकर पूरा सत्र **15 से 30 मिनट** तक का हो सकता है। **नोट:** कुल सत्रों की संख्या और डोज़ कैंसर के प्रकार, स्टेज, मरीज की उम्र और शारीरिक स्थिति पर निर्भर करती है। कुछ मामलों में (जैसे SBRT) कम सत्रों में अधिक डोज़ दी जाती है, जबकि पारंपरिक उपचार कई हफ्तों तक चल सकता है। _3. निगरानी और पुनः मूल्यांकन:_ इलाज के दौरान डॉक्टर मरीज की स्थिति की लगातार निगरानी करते हैं और जरूरत पड़ने पर उपचार योजना को समायोजित करते हैं। **रेडिएशन थेरेपी के साइड इफेक्ट्स क्या हैं? | Radiation Therapy Ke Side Effects** रेडिएशन थेरेपी के साइड इफेक्ट्स आमतौर पर अस्थायी होते हैं और इलाज पूरा होने के बाद धीरे-धीरे ठीक हो जाते हैं। ये साइड इफेक्ट्स कैंसर के स्थान और थेरेपी के प्रकार पर निर्भर करते हैं। **1. थकावट (Fatigue)** रेडिएशन के दौरान शरीर की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा कोशिकाओं की मरम्मत में लगता है। यह थकावट इलाज के दौरान बढ़ सकती है और उपचार के बाद भी कुछ हफ्तों तक बनी रह सकती है। _कैसे संभालें:_ पर्याप्त नींद लें, हल्का व्यायाम करें (जैसे टहलना), और पोषणयुक्त आहार लें। **2. रेडिएशन वाली जगह पर त्वचा में बदलाव (Skin Reactions)** प्रभावित क्षेत्र में लालिमा, सूजन, खुजली या जलन हो सकती है — कभी-कभी सनबर्न जैसी। _कैसे संभालें:_ त्वचा को ठंडे पानी से धोएं, डॉक्टर द्वारा बताई गई क्रीम लगाएं, टाइट कपड़े और धूप से बचें। **3. पेट और पाचन संबंधी समस्याएं (Gastrointestinal Side Effects)** पेट, पेल्विक या पेट के निचले हिस्से में रेडिएशन होने पर मिचली, उल्टी, अपच या दस्त हो सकते हैं। _कैसे संभालें:_ हल्का, सुपाच्य भोजन करें, तरल पदार्थ अधिक लें और डॉक्टर द्वारा बताई दवाओं का पालन करें। **4. प्रभावित क्षेत्र में बालों का झड़ना (Localized Hair Loss)** सिर या गर्दन के क्षेत्र में रेडिएशन होने पर उसी क्षेत्र के बाल झड़ सकते हैं। यह पूरे शरीर के बालों का झड़ना नहीं है (जो कीमोथेरेपी में होता है)। _कैसे संभालें:_ हल्के शैम्पू का उपयोग करें, सावधानी से कंघी करें और स्कार्फ या कैप पहनें। **5. भूख में कमी (Loss of Appetite)** स्वाद में बदलाव, मुँह में सूखापन या मिचली के कारण भूख कम हो सकती है, जिससे कमजोरी और वजन घट सकता है। _कैसे संभालें:_ थोड़े-थोड़े अंतराल पर पोषणयुक्त आहार लें, तरल आहार शामिल करें और जरूरत पड़े तो डाइटीशियन से सलाह लें। **रेडिएशन थेरेपी के साइड इफेक्ट्स को कौन मैनेज करता है? | Radiation Therapy Team** रेडिएशन थेरेपी एक समर्पित विशेषज्ञ टीम की देखरेख में दी जाती है: - **रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट:** इलाज की योजना बनाते हैं और साइड इफेक्ट्स की निगरानी करते हैं - **मेडिकल फिजिसिस्ट:** मशीनों की सटीकता और सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं - **रेडिएशन थेरेपिस्ट और टेक्नीशियन:** थेरेपी को सही तरीके से लागू करते हैं - **नर्सिंग स्टाफ:** मरीज की देखभाल और लक्षणों पर ध्यान देते हैं - **डाइटीशियन:** इलाज के दौरान व्यक्तिगत पोषण संबंधी सलाह देते हैं - **मनोवैज्ञानिक और सपोर्ट स्टाफ:** मानसिक और भावनात्मक सहयोग प्रदान करते हैं **रेडिएशन थेरेपी के बाद देखभाल कैसे करें? | Radiation Therapy Ke Baad Dekhbhal** रेडिएशन थेरेपी के बाद शरीर को रिकवर होने में समय लगता है। सही देखभाल साइड इफेक्ट्स को कम करती है और इलाज के असर को बेहतर बनाती है। _1. पर्याप्त पानी पिएं:_ रोजाना पर्याप्त पानी और तरल पदार्थ लें ताकि शरीर की कोशिकाएं तेजी से ठीक हो सकें। _2. पौष्टिक आहार लें:_ अधिकतर रेडिएशन सेंटरों में डाइटीशियन हर मरीज के लिए व्यक्तिगत डाइट प्लान तैयार करते हैं। यदि आपको डाइट प्लान नहीं मिला है, तो अपने रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट से माँगें। किसी भी घरेलू उपाय से पहले डॉक्टर की सलाह जरूरी है। _3. दवाएं नियमित लें:_ साइड इफेक्ट्स कम करने, सूजन घटाने या संक्रमण रोकने के लिए दी गई दवाएं समय पर और पूरी अवधि तक लें। _4. त्वचा का ध्यान रखें:_ डॉक्टर की सलाह से मॉइश्चराइज़र लगाएं। त्वचा को रगड़ने, गर्म पानी से धोने या सीधे धूप में जाने से बचें। _5. नए लक्षण तुरंत बताएं:_ अत्यधिक थकावट, त्वचा में घाव, बुखार या उल्टी जैसे कोई भी असामान्य लक्षण दिखें तो अपने रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट से तुरंत संपर्क करें। **निष्कर्ष** रेडिएशन थेरेपी कैंसर के इलाज का एक सिद्ध और प्रभावी विकल्प है। इसके साइड इफेक्ट्स ज़्यादातर अस्थायी होते हैं और विशेषज्ञ टीम की देखरेख में इन्हें अच्छी तरह प्रबंधित किया जा सकता है। सही जानकारी, नियमित डॉक्टर की सलाह और उचित देखभाल के साथ रेडिएशन थेरेपी कैंसर से लड़ने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
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Cancer me kya khayen aur kya nhi?

Dr. Pranati Narayan

24 Feb, 2026

Cancer Me Kya Khayen Aur Kya Nhi?

कैंसर के इलाज के दौरान सही आहार उतना ही जरूरी है जितना सही दवाई। कीमोथेरेपी, रेडिएशन या सर्जरी के दौरान शरीर को अतिरिक्त पोषण की जरूरत होती है — ताकि इलाज को सहन कर सके, जल्दी रिकवर हो सके और इम्यून सिस्टम मजबूत रहे। इस लेख में हम जानेंगे कि कैंसर में क्या खाना चाहिए, क्या नहीं खाना चाहिए और किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। **जरूरी बात:** यहाँ दी गई जानकारी सामान्य दिशा-निर्देशों पर आधारित है। हर मरीज की स्थिति, कैंसर का प्रकार और इलाज अलग होता है। कोई भी आहार बदलाव करने से पहले अपने ऑन्कोलॉजिस्ट या डाइटीशियन से सलाह अवश्य लें। **कैंसर में क्या खाना चाहिए? | Cancer Mein Kya Khana Chahiye?** **1. प्रोटीन युक्त आहार (Protein-Rich Foods)** कैंसर के इलाज के दौरान शरीर की मांसपेशियां कमजोर हो सकती हैं और ऊतकों की मरम्मत के लिए प्रोटीन जरूरी होती है। इसलिए दाल, अंडे, मछली, टोफू, दूध और डेयरी उत्पाद नियमित रूप से लेने चाहिए। **2. फल और सब्जियां (Fruits and Vegetables)** हरी पत्तेदार सब्जियां (पालक, मेथी) और रंग-बिरंगे फल (संतरा, पपीता, कीवी) शरीर को जरूरी विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स देते हैं जो इम्यून सिस्टम को मजबूत करते हैं। फलों और सब्जियों को हमेशा अच्छी तरह धोकर खाएं। **3. स्वस्थ वसा — ओमेगा-3 (Healthy Fats)** मछली (सालमन, टूना) और अलसी (flaxseeds) में पाए जाने वाले ओमेगा-3 फैटी एसिड्स शरीर में सूजन कम करने और इलाज के दौरान ताकत बनाए रखने में मदद करते हैं। **4. साबुत अनाज और कार्बोहाइड्रेट्स (Whole Grains)** ओट्स, ब्राउन राइस, क्विनोआ और साबुत गेहूं से शरीर को धीरे-धीरे ऊर्जा मिलती है। इलाज के दौरान भूख कम होने पर भी ये अनाज शरीर का वजन और ऊर्जा बनाए रखने में मदद करते हैं। **5. पर्याप्त पानी और हाइड्रेशन (Hydration)** कीमोथेरेपी और रेडिएशन थेरेपी के कारण शरीर में पानी की कमी हो सकती है। रोजाना पर्याप्त पानी पिएं। इसके अलावा नारियल पानी, ताजे फलों का जूस और सूप भी हाइड्रेशन में मदद करते हैं। **6. विटामिन और खनिज — सावधानी के साथ (Vitamins and Minerals)** विटामिन D, C और E इम्यून सिस्टम के लिए जरूरी हैं, और जिंक, सेलेनियम, आयरन सेल रिपेयर और हीमोग्लोबिन बनाए रखने में मदद करते हैं। **महत्वपूर्ण:** उच्च खुराक वाले एंटीऑक्सीडेंट सप्लीमेंट्स (जैसे विटामिन C या E की गोलियां) कीमोथेरेपी और रेडिएशन के असर को कम कर सकते हैं। कोई भी सप्लीमेंट लेने से पहले अपने डॉक्टर से अनुमति लें। **कैंसर में क्या नहीं खाना चाहिए? | Cancer Mein Kya Nahi Khana Chahiye?** **1. तला हुआ और प्रोसेस्ड भोजन (Fried and Processed Food)** जंक फूड, चिप्स, बर्गर जैसे खाद्य पदार्थों में ट्रांस फैट और अतिरिक्त शक्कर होती है जो शरीर में सूजन बढ़ाती है और इलाज में बाधा डाल सकती है। **2. अत्यधिक चीनी और मीठी चीजें (Excess Sugar)** ज्यादा चीनी शरीर में सूजन बढ़ा सकती है और इम्यून सिस्टम को कमजोर कर सकती है। मीठे पैक्ड ड्रिंक्स, चॉकलेट और मिठाइयों से परहेज करें। हालाँकि अगर भूख बिल्कुल न लगे तो डॉक्टर की सलाह से सीमित मात्रा में शहद जैसी प्राकृतिक मिठास ली जा सकती है। **3. रेड मीट और प्रोसेस्ड मीट (Red and Processed Meat)** बीफ, भेड़ का मांस, सॉसेज और बेकन में नाइट्रेट्स और नाइट्राइट्स होते हैं जो कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि को बढ़ावा दे सकते हैं। इनका सेवन कम से कम करें। **4. शराब (Alcohol)** शराब कैंसर के जोखिम को बढ़ाती है, इम्यून सिस्टम को कमजोर करती है और इलाज की प्रभावशीलता को कम कर सकती है। कैंसर के इलाज के दौरान इससे पूरी तरह बचें। **5. अत्यधिक नमक (Excess Sodium)** ज्यादा नमक शरीर में जल प्रतिधारण और उच्च रक्तचाप का कारण बन सकता है, जो इलाज पर नकारात्मक असर डालता है। खाने में नमक की मात्रा नियंत्रित रखें। **कैंसर के मरीजों के लिए जरूरी आहार नियम | Cancer Diet Ke Important Niyam** _भोजन को छोटे हिस्सों में बाँटें:_ अगर भूख कम हो या थकान हो तो दिन में 5-6 बार थोड़ा-थोड़ा खाएं। इससे पाचन आसान रहेगा और ऊर्जा बनी रहेगी। _हमेशा ताजा भोजन खाएं:_ पुराना, बासी या बाहर का खाना संक्रमण का खतरा बढ़ाता है। घर का ताजा बना खाना सबसे सुरक्षित है। _फलों और सब्जियों को अच्छी तरह धोएं:_ जब भी संभव हो, ऐसे फल चुनें जिनका छिलका निकाला जा सके (जैसे केला, पपीता, कीवी) — इससे संक्रमण का खतरा कम होता है। _कच्चा भोजन और सावधानी:_ जिन मरीजों की कीमोथेरेपी के कारण श्वेत रक्त कोशिकाएं (WBC) बहुत कम हो जाती हैं, उनके लिए डॉक्टर कच्चे खाने से परहेज की सलाह दे सकते हैं। यह सभी कैंसर मरीजों के लिए नहीं, केवल विशेष परिस्थितियों में लागू होता है — इसलिए अपने डॉक्टर से पूछें। _मुँह या गले के कैंसर में विशेष ध्यान:_ ऐसे मरीजों को खाने में परेशानी हो सकती है। दही-चावल, खिचड़ी, शहद जैसे हल्के और नरम खाद्य पदार्थ बेहतर विकल्प हैं। _बिना डॉक्टर की सलाह के कोई "कैंसर डाइट" न अपनाएं:_ सोशल मीडिया या गैर-चिकित्सीय स्रोतों से मिले आहार सुझाव कभी-कभी नुकसानदेह हो सकते हैं। किसी भी आहार बदलाव से पहले अपने ऑन्कोलॉजिस्ट से सलाह लें। **निष्कर्ष** सही आहार कैंसर के इलाज में एक महत्वपूर्ण सहायक भूमिका निभाता है — शरीर को ताकत देता है, रिकवरी तेज करता है और इम्यून सिस्टम को सहारा देता है। लेकिन यह स्पष्ट रूप से समझना जरूरी है कि **केवल आहार से कैंसर का इलाज नहीं होता।** सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडिएशन और इम्यूनोथेरेपी जैसे चिकित्सीय उपचार अनिवार्य हैं। सही आहार इन्हीं उपचारों के असर को बेहतर बनाने में मदद करता है।
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Breast Cancer Me Kya Khana Chahiye?

Dr. Pranati Narayan

25 Feb, 2026

Breast Cancer Me Kya Khana Chahiye?

ब्रेस्ट कैंसर के इलाज के दौरान सही आहार शरीर को कीमोथेरेपी, रेडिएशन और सर्जरी के प्रभावों से उबरने में मदद करता है, इम्यून सिस्टम को सहारा देता है और वजन को नियंत्रित रखता है। लेकिन ब्रेस्ट कैंसर में आहार की कुछ विशेष बातें हैं — जैसे soy products को लेकर confusion और हार्मोन थेरेपी के साथ कुछ खाद्य पदार्थों का interaction — जो इसे सामान्य कैंसर डाइट से थोड़ा अलग बनाती हैं। **जरूरी बात:** यह लेख सामान्य दिशा-निर्देशों पर आधारित है। हर मरीज की स्थिति, कैंसर का प्रकार (hormone receptor-positive या negative) और इलाज अलग होता है। कोई भी आहार बदलाव करने से पहले अपने ऑन्कोलॉजिस्ट और डाइटीशियन से सलाह अवश्य लें। **ब्रेस्ट कैंसर में क्या खाना चाहिए? | Breast Cancer Mein Kya Khana Chahiye?** **1. प्रोटीन युक्त आहार (Protein-Rich Foods)** कीमोथेरेपी और सर्जरी के दौरान शरीर की मरम्मत और मांसपेशियों की ताकत बनाए रखने के लिए प्रोटीन जरूरी है: - दालें और फलियाँ (अरहर, मसूर, मूँग, राजमा) - अंडे (अच्छी तरह पके हुए) - मछली — खासकर omega-3 से भरपूर (सालमन, रोहू, टूना) - दही और पनीर (pasteurized) - चिकन या टर्की (बिना तला, उबला या grilled) - नट्स और बीज (अखरोट, बादाम, अलसी) **2. फाइबर युक्त आहार (Fibre-Rich Foods)** फाइबर पाचन तंत्र को स्वस्थ रखता है, शरीर से विषाक्त पदार्थ बाहर निकालता है और वजन नियंत्रित रखने में मदद करता है — जो ब्रेस्ट कैंसर में विशेष रूप से जरूरी है: - साबुत अनाज (दलिया, ब्राउन राइस, ओट्स, क्विनोआ) - हरी सब्जियाँ (पालक, मेथी, ब्रोकोली) - फल (सेब, पपीता, नाशपाती) - दालें और बीन्स **3. एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर फल और सब्जियाँ (Antioxidant-Rich Foods)** फल और सब्जियों में पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट्स इम्यून सिस्टम को सहारा देते हैं और शरीर में सूजन कम करने में मदद करते हैं: - ब्लूबेरी, स्ट्रॉबेरी, अनार - गाजर, चुकंदर, टमाटर - हरी पत्तेदार सब्जियाँ - अंगूर, आम, पपीता **महत्वपूर्ण:** food-based antioxidants सुरक्षित हैं, लेकिन **high-dose antioxidant supplements (Vitamin C, E की गोलियाँ) कीमोथेरेपी या रेडिएशन के असर को कम कर सकते हैं।** कोई भी supplement लेने से पहले डॉक्टर से पूछें। **4. स्वस्थ वसा — ओमेगा-3 (Healthy Fats)** ओमेगा-3 फैटी एसिड्स सूजन कम करने और इम्यून सिस्टम को सहारा देने में मदद करते हैं: - मछली (सालमन, टूना) - अलसी (flaxseeds) और चिया बीज - अखरोट - जैतून का तेल (खाना पकाने के लिए) - एवोकाडो ट्रांस फैट और saturated fat (जैसे घी, मक्खन, नारियल तेल की अधिक मात्रा) को सीमित करें। **5. Soy Products — Hormone Receptor-Positive Cancer में सावधानी (Soy and Phytoestrogens)** यह ब्रेस्ट कैंसर का एक बहुत common सवाल है। Soy में phytoestrogens होते हैं जो शरीर में estrogen जैसा असर कर सकते हैं। **Hormone receptor-positive (HR+) ब्रेस्ट कैंसर** में इसे लेकर अक्सर confusion होती है। वर्तमान शोध के अनुसार, **सामान्य मात्रा में food-based soy** (जैसे टोफू, सोया दूध, एडामामे) अधिकतर मरीजों के लिए सुरक्षित माना जाता है। लेकिन **high-dose soy supplements या soy protein powder** से बचना चाहिए। **अपने ऑन्कोलॉजिस्ट से पूछें** कि आपके कैंसर के प्रकार में soy लेना सुरक्षित है या नहीं — खासकर अगर आप Tamoxifen या अन्य hormone therapy पर हैं। **6. वजन नियंत्रण के लिए संतुलित आहार (Weight Management)** ब्रेस्ट कैंसर में obesity एक जोखिम कारक है और hormone therapy के दौरान वजन बढ़ना भी common है। इसलिए: - calorie-dense लेकिन nutrient-poor खाने (जैसे मिठाइयाँ, तला खाना) से बचें - portion size का ध्यान रखें - दिन में 5-6 बार थोड़ा-थोड़ा खाएं - हल्का व्यायाम (जैसे टहलना) डॉक्टर की सलाह पर जारी रखें **7. पर्याप्त हाइड्रेशन (Hydration)** कीमोथेरेपी के दौरान शरीर को पानी की अधिक जरूरत होती है: - पर्याप्त पानी (दिन में 8-10 गिलास या डॉक्टर की सलाह अनुसार) - नारियल पानी - ताजे फलों का जूस (बिना चीनी के) - सूप और शोरबा **हर्बल चाय से सावधानी:** कुछ हर्बल teas (जैसे green tea की अधिक मात्रा) Tamoxifen जैसी hormone therapy दवाओं के साथ interact कर सकती हैं। कोई भी हर्बल पेय लेने से पहले डॉक्टर से पूछें। **ब्रेस्ट कैंसर में क्या नहीं खाना चाहिए? | Breast Cancer Mein Kya Nahi Khana Chahiye?** **1. शराब — पूरी तरह बंद करें (No Alcohol)** शराब ब्रेस्ट कैंसर के जोखिम को बढ़ाने वाले सबसे established कारकों में से एक है। इलाज के दौरान यह इम्यून सिस्टम को कमजोर करती है और hormone therapy की प्रभावशीलता को भी प्रभावित कर सकती है। **2. तला हुआ और प्रोसेस्ड भोजन (Fried and Processed Food)** इनमें ट्रांस फैट, अतिरिक्त नमक और preservatives होते हैं जो शरीर में सूजन बढ़ाते हैं, वजन बढ़ाते हैं और इलाज में बाधा डाल सकते हैं। **3. अत्यधिक चीनी और मीठे खाद्य पदार्थ (Excess Sugar)** ज्यादा चीनी वजन बढ़ाती है और शरीर में सूजन बढ़ा सकती है। मीठे पैक्ड ड्रिंक्स, बेकरी प्रोडक्ट्स और मिठाइयों से परहेज करें। **4. Red Meat और Processed Meat** बीफ, भेड़ का मांस, सॉसेज और बेकन में saturated fat और नाइट्रेट्स होते हैं। इन्हें कम से कम करें और lean protein स्रोत प्राथमिकता दें। **5. High-dose Soy Supplements** जैसा ऊपर बताया गया — food-based soy सामान्यतः ठीक है, लेकिन soy supplements, soy protein powder या isoflavone capsules बिना डॉक्टर की सलाह के न लें। **6. बिना डॉक्टर की सलाह के कोई supplement न लें** Vitamin D, calcium, iron या कोई भी हर्बल supplement — ये सभी कैंसर की दवाओं के साथ interact कर सकते हैं। कोई भी supplement डॉक्टर की अनुमति के बाद ही लें। **ब्रेस्ट कैंसर में आहार के जरूरी नियम | Breast Cancer Diet Ke Important Niyam** _भोजन को छोटे हिस्सों में बाँटें:_ दिन में 5-6 बार थोड़ा-थोड़ा खाएं। इससे मतली कम होती है और शरीर को पोषण मिलता रहता है। _ताजा और घर का बना खाना खाएं:_ बाहर का खाना और पैक्ड food से संक्रमण और अनावश्यक chemicals का खतरा होता है। _वजन पर ध्यान दें:_ hormone therapy के दौरान वजन बढ़ना आम है — डाइटीशियन से personal diet plan लें। _Tamoxifen या hormone therapy पर हों तो:_ grapefruit और grapefruit juice से बचें — यह Tamoxifen के metabolism को प्रभावित कर सकता है। अपने डॉक्टर से food-drug interactions के बारे में specifically पूछें। _बिना डॉक्टर की सलाह के कोई "कैंसर डाइट" न अपनाएं:_ सोशल मीडिया पर प्रचलित detox diets या miracle foods से दूर रहें। **निष्कर्ष** ब्रेस्ट कैंसर में सही आहार इलाज को सहारा देता है — शरीर को ताकत देता है, वजन नियंत्रित रखता है और साइड इफेक्ट्स को कम करने में मदद करता है। **लेकिन केवल आहार से ब्रेस्ट कैंसर का इलाज नहीं होता** — कीमोथेरेपी, रेडिएशन, सर्जरी और hormone therapy जैसे चिकित्सीय उपचार अनिवार्य हैं। सही आहार इन उपचारों को बेहतर तरीके से सहने और जल्दी रिकवर होने में मदद करता है।
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Breast Cancer Me Gaanth Ki Pahchan -- Kya Dard Hota Hai?

Dr. Pranati Narayan

26 Feb, 2026

Breast Cancer Me Gaanth Ki Pahchan Kya Dard Hota Hai?

<u>**निष्कर्ष**</u> ब्रेस्ट कैंसर की गांठ अधिकतर कठोर, असमान और दर्दरहित होती है — लेकिन हर गांठ कैंसर नहीं होती। सबसे जरूरी बात यह है कि **दर्द न होना यह नहीं दर्शाता कि सब ठीक है।** नियमित BSE, समय पर mammography और किसी भी बदलाव पर तुरंत डॉक्टर से मिलना — यही तीन कदम ब्रेस्ट कैंसर को जल्दी पकड़ने और सफलतापूर्वक इलाज करने की सबसे बड़ी चाबी हैं। अगर आपको या आपके किसी परिचित को स्तन में कोई भी असामान्य बदलाव महसूस हो, तो [BigOHealth](https://bigohealth.com/cancer/best-doctor-for-breast-cancer-in-delhi) के माध्यम से किसी ऑन्कोलॉजिस्ट से तुरंत परामर्श लें। स्तन में गांठ महसूस होना हर महिला के लिए चिंता का कारण बन सकता है — लेकिन यह जानना जरूरी है कि **सभी गांठें कैंसर नहीं होतीं।** कुछ गांठें पूरी तरह सामान्य और हानिरहित होती हैं। लेकिन कुछ जरूरी संकेत हैं जो कैंसर की गांठ को सामान्य गांठ से अलग करते हैं — और इन्हें समय पर पहचानना जीवन बचा सकता है। **जरूरी बात:** इस लेख में दी गई जानकारी सामान्य जागरूकता के लिए है। अगर आपको स्तन में कोई भी बदलाव महसूस हो — चाहे दर्द हो या न हो — तो बिना देर किए किसी ऑन्कोलॉजिस्ट से जांच करवाएं। <u>**स्तन में गांठ के प्रकार — कैंसर और गैर-कैंसर | Breast Mein Gaanth Ke Prakar**</u> स्तन में गांठ दो प्रमुख प्रकार की होती है: **1. सामान्य (Benign) गांठें — जो कैंसर नहीं होतीं** _फाइब्रोएडेनोमा (Fibroadenoma):_ सबसे आम benign गांठ। गोल या अंडाकार, मुलायम, चिकनी और आसानी से हिलने वाली। आमतौर पर दर्दरहित। युवा महिलाओं में हार्मोनल बदलाव के कारण होती है। अधिकतर बिना इलाज के ठीक हो जाती है; बड़ी होने पर सर्जरी हो सकती है। _फाइब्रोसिस्टिक बदलाव (Fibrocystic Changes):_ हार्मोनल बदलाव से स्तन में पानी भरे छोटे थैले (cysts) बनते हैं। मासिक धर्म से पहले दर्द और सूजन बढ़ सकती है। ऊपरी हिस्से में अधिक होती है। प्रबंधन के विकल्पों में दर्दनिवारक दवाएं, हार्मोनल उपचार या cyst drainage शामिल हैं — डॉक्टर से सलाह लें। _लिपोमा (Lipoma):_ वसा से बनी नरम गांठ, धीरे-धीरे बढ़ती है, दर्दरहित और हानिरहित। **2. कैंसरस गांठें — जिन्हें पहचानना जरूरी है** कैंसर की गांठ की कुछ खास विशेषताएं होती हैं जो इसे benign गांठ से अलग करती हैं — लेकिन **केवल डॉक्टर और जांच ही निश्चित रूप से बता सकती है** कि गांठ कैंसर है या नहीं। <u>**ब्रेस्ट कैंसर की गांठ कैसी होती है? | Breast Cancer Ki Gaanth Kaisi Hoti Hai?**</u> _कठोर (Hard):_ Cancer की गांठ आमतौर पर कठोर और मजबूत महसूस होती है — fibroadenoma की तरह नरम नहीं। _असमान आकार (Irregular Shape):_ गोल या अंडाकार नहीं होती। किनारे असमान और अनियमित होते हैं। _स्थिर (Fixed):_ आसपास के ऊतकों से जुड़ी होती है — दबाने पर आसानी से नहीं हिलती। _धीरे-धीरे बढ़ती है:_ समय के साथ आकार बदलता रहता है। _अधिकतर दर्दरहित:_ यह सबसे महत्वपूर्ण बात है — **कैंसर की गांठ में शुरुआत में दर्द नहीं होता।** इसीलिए महिलाएं अक्सर इसे नज़रअंदाज़ कर देती हैं। <u>**क्या ब्रेस्ट कैंसर की गांठ में दर्द होता है? | Kya Breast Cancer Ki Gaanth Mein Dard Hota Hai?**</u> यह सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला सवाल है — और इसका सीधा जवाब है: **अधिकतर नहीं।** शुरुआती अवस्था में कैंसर की गांठ में दर्द इसलिए नहीं होता क्योंकि कैंसर कोशिकाएं तब तक आसपास की नसों (nerves) को प्रभावित नहीं करतीं। यही कारण है कि यह बीमारी लंबे समय तक छिपी रह सकती है। **एक जरूरी बात:** अगर स्तन में दर्द हो तो यह अधिकतर benign कारणों से होता है — जैसे fibrocystic changes, mastitis या hormonal changes। **दर्द होना cancer का reliable indicator नहीं है, और दर्द न होना यह नहीं दर्शाता कि सब ठीक है।** कैंसर में दर्द कब हो सकता है: - जब कैंसर आसपास के ऊतकों या lymph nodes में फैल जाए - Inflammatory Breast Cancer (IBC) में — जो एक aggressive प्रकार है (नीचे देखें) - Advanced stage में जब cancer हड्डियों या अन्य अंगों में फैले <u>**ब्रेस्ट कैंसर की गांठ कहाँ होती है? | Breast Cancer Ki Gaanth Kahan Hoti Hai?**</u> Cancer की गांठ स्तन में कहीं भी हो सकती है — कोई निश्चित स्थान नहीं है। लेकिन सबसे अधिक यहाँ पाई जाती है: _ऊपरी बाहरी हिस्सा (Upper Outer Quadrant):_ सबसे आम स्थान — लगभग 50% cases में। यह वह area है जो underarm के पास होता है। _निप्पल के आसपास:_ इस स्थान पर गांठ होने पर निप्पल में बदलाव जल्दी दिखते हैं। _अंडरआर्म (Axilla):_ अगर cancer lymph nodes तक फैल जाए तो underarm में सूजन या गांठ महसूस हो सकती है — यह cancer के फैलाव का संकेत है। _स्तन के अन्य हिस्से:_ निचला या भीतरी हिस्सा — कम आम लेकिन संभव। <u>**ब्रेस्ट कैंसर की गांठ का आकार | Breast Cancer Ki Gaanth Kitni Badi Hoti Hai?**</u> गांठ का आकार और cancer की stage का संबंध है — लेकिन **size अकेले stage नहीं बताती।** Staging tumor size, lymph node involvement और metastasis तीनों पर निर्भर करती है। _Stage 1:_ गांठ आमतौर पर ≤2 cm, केवल स्तन तक सीमित, lymph nodes प्रभावित नहीं। इस stage में पता चलने पर इलाज सबसे प्रभावी होता है। _Stage 2:_ गांठ 2-5 cm तक, या छोटी गांठ के साथ lymph nodes भी प्रभावित। दोनों में से कोई एक स्थिति stage 2 हो सकती है। _Stage 3:_ गांठ बड़ी हो सकती है, lymph nodes व्यापक रूप से प्रभावित, लेकिन cancer दूर के अंगों तक नहीं फैला। _Stage 4:_ **Stage 4 tumor size से नहीं, बल्कि distant metastasis से define होती है।** यानी एक छोटी सी गांठ भी Stage 4 हो सकती है अगर cancer फेफड़ों, हड्डियों या लिवर तक फैल चुका हो। **महत्वपूर्ण:** DCIS (Ductal Carcinoma in Situ) जैसे early cancers अक्सर बिना किसी पalpable गांठ के होते हैं — केवल mammography से पकड़ में आते हैं। Inflammatory Breast Cancer (IBC) में भी गांठ नहीं होती बल्कि स्तन में अचानक लालिमा, गर्मी और सूजन होती है — यह सबसे aggressive प्रकार है। <u>**ब्रेस्ट कैंसर के अन्य लक्षण — सिर्फ गांठ नहीं | Breast Cancer Ke Anya Lakshan**</u> Cancer की पहचान सिर्फ गांठ से नहीं होती। इन बदलावों पर भी ध्यान दें: _निप्पल में बदलाव:_ निप्पल का अंदर की ओर धंसना (retraction), निप्पल से खून, पानी या पीले रंग का discharge। _त्वचा में बदलाव:_ लालिमा, सूजन, खिंचाव। **पो द'ऑरेंज (Peau d'orange)** — त्वचा का संतरे के छिलके जैसा दिखना — यह Inflammatory Breast Cancer का विशेष संकेत है। _स्तन के आकार में बदलाव:_ एक स्तन का अचानक बड़ा होना या असामान्य रूप से भारी लगना। _अंडरआर्म में सूजन:_ Lymph nodes में cancer फैलने का संकेत। _IBC के विशेष लक्षण:_ बिना गांठ के अचानक स्तन में लालिमा, गर्मी, भारीपन और Peau d'orange — यह medical emergency है। तुरंत डॉक्टर से मिलें। <u>**ब्रेस्ट का आत्म-परीक्षण कैसे करें? | Breast Self-Examination (BSE) Kaise Karein?**</u> BSE हर महिला को **महीने में एक बार** करना चाहिए। **सही समय:** मासिक धर्म के 3-5 दिन बाद — जब स्तन कम tender होते हैं। Post-menopausal महिलाएं हर महीने एक निश्चित तारीख चुनें। _Step 1 — आईने में देखें:_ सीधे खड़े होकर दोनों स्तनों को देखें। आकार, रूप और त्वचा में कोई असामान्यता देखें। _Step 2 — हाथ उठाकर देखें:_ दोनों हाथ सिर के ऊपर उठाएं। देखें कि कोई खिंचाव, सूजन या असामान्य बदलाव दिखता है या नहीं। _Step 3 — हाथों से जांचें (खड़े होकर):_ तीन अंगुलियों के पैड से गोलाकार गति में पूरे स्तन को दबाते हुए जांचें। ऊपर से नीचे, बाहर से निप्पल तक। कठोर, अटकी हुई या असामान्य गांठ की तलाश करें। _Step 4 — लेटकर जांचें:_ एक तकिया कंधे के नीचे रखें, उसी तरफ का हाथ सिर के नीचे। दूसरे हाथ से पूरे स्तन को जांचें। यह position में स्तन का ऊतक फैल जाता है और जांच आसान होती है। _Step 5 — निप्पल जांचें:_ निप्पल को धीरे से दबाएं। कोई discharge तो नहीं? _Step 6 — अंडरआर्म जांचें:_ हाथ उठाकर underarm में भी गांठ या सूजन देखें। **BSE की सीमाएं:** BSE सहायक है लेकिन mammography की जगह नहीं लेती। BSE से छोटी या deep गांठें miss हो सकती हैं। <u>**डॉक्टर से कब मिलें? | Doctor Se Kab Milein?**</u> इनमें से कोई भी लक्षण हो तो **बिना देर किए** डॉक्टर से मिलें: - कोई नई गांठ महसूस हो — चाहे दर्द हो या न हो - गांठ का आकार बढ़ रहा हो - निप्पल से कोई भी discharge हो - निप्पल अंदर की ओर धंस रहा हो - त्वचा में लालिमा, सूजन या Peau d'orange दिखे - अंडरआर्म में सूजन हो - एक स्तन का आकार अचानक बदले - स्तन में अचानक गर्मी और लालिमा (IBC का संकेत) — यह emergency है <u>**मैमोग्राफी कब शुरू करें?**</u> - सामान्य जोखिम वाली महिलाएं: 40-45 वर्ष की आयु से नियमित mammography शुरू करें - उच्च जोखिम (family history, BRCA gene): डॉक्टर की सलाह पर 30-35 वर्ष की आयु से या उससे पहले
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